scriptBrother-sister relationship is above religion and caste, bond is not b | धर्म और जाति से ऊपर है भाई-बहन का रिश्ता, मुश्किलों में भी नहीं टूटा बंधन | Patrika News

धर्म और जाति से ऊपर है भाई-बहन का रिश्ता, मुश्किलों में भी नहीं टूटा बंधन

रक्षाबंधन आज: अपनेपन और आत्मीयता से जुड़ा है राखी का बंधन

ग्वालियर

Published: August 22, 2021 10:44:00 am

ग्वालियर.

राखी एक ऐसा बंधन है, जो अपनेपन और आत्मीयता से जुड़ा है। यह बंधन प्रतीक है भाई और बहन के अटूट रिश्ते का। स्नेह की यह पोटली धर्म और जाति से कहीं ऊपर है। देश में ऐसे कई रिश्ते देखने को मिलते हैं, जिसमें अलग-अलग धर्म के लोग राखी का यह बंधन पिछले कई वर्षों से निभा रहे हैं। वहीं कई ऐसे लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी बहन की खुशी के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। रक्षाबंधन के अवसर पर हम आपको कुछ ऐसे ही लोगों से परिचित करा रहे हैं।
धर्म और जाति से ऊपर है भाई-बहन का रिश्ता, मुश्किलों में भी नहीं टूटा बंधन
धर्म और जाति से ऊपर है भाई-बहन का रिश्ता, मुश्किलों में भी नहीं टूटा बंधन
1982 से पवैया बंधवा रहे जैनव बाई से राखी
पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया 1982 से जैनव बाई से राखी बंधवा रहे हैं। उनके रिश्ते में कभी हिंदू और मुश्किल का सवाल नहीं आया। हर सुख दुख में दोनों एक दूसरे की परवाह करते हैं। बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान जब सीबीआई की रेड पवैया के यहां पड़ी, तब घर पर कोई नहीं था। इस पर जैनव बाई ने डेढ़ घंटे तक सीबीआई को दरवाजे से अंदर घुसने नहीं दिया था। 29 साल से पवैया भाई होने का फर्ज निभा रहे हैं। शादी में भी वह भाई के नाते सारे रस्म पूरे करते हैं।
15 साल पहले मीना से बंधाई राखी, रिश्ता आज भी कायम
पन्द्रह साल पहले मेरी एसएन शर्मा से मुलाकात हुई। हम दोनों सेम डिपार्टमेंट में थे। बात-बात में उनकी पत्नी इलाहाबाद की निकली, जहां से मैं भी था। तब उन्होंने कहा कि आप हमारे साले हुए। मैंने हामी भर दी और तब से मीना मेरी बहन बन गई। वह हर रक्षाबंधन में मुझे राखी बांधने लगी। आज भी जब हम नहीं मिल पाते, तो वह मुझे राखी पोस्ट करती है। हम लोगों में फैमिली रिलेशन है। हर फंक्शन में हम साथ होते हैं। जो बॉन्डिंग हममे है, वही बॉन्डिंग हमारे बच्चों में भी है। मैं मीना के बच्चों के साथ मामा का फर्ज निभाता हूं।
वसीम अंसारी, एक्स एयरपोर्ट डायरेक्टर ग्वालियर

बहन को इंजीनियर बनाने लगाई फेरी, गार्ड की नौकरी की
पापा की केदारपुर में परचून की दुकान थी। 2006 में वह कैंसर से नहीं रहे। अब घर में हम दो भाई बहन और मां थी। बहन का सपना इंजीनियर बनना था, लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि उसका एडमिशन करा सके। उसके सपने को पूरा करने के लिए मैंने किराना दुकान संभालने के साथ साइकिल से गांव-गांव फेरी लगाई। कपड़े बेचे। रात में गार्ड की नौकरी की और बहन को इंजीनियरिंग का कोर्स कराया। उसकी 2014 में दिल्ली में जॉब लग गई। आज बहन की शादी हो गई है और वह यूके में है और मैंने चॉकलेट का बिजनेस डाल लिया है।
सोनू निगम, बिजनेसमैन

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