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यह रिपोर्ट हर साल दिखाती है सरकार को आईना

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में खुलासा...सेहत और जनजीवन से खिलवाड़ होता रहा, तब भी
सरकार की तरफ से अदालत में नहीं की गई अपील

ग्वालियर

Updated: December 23, 2021 12:25:08 am

ग्वालियर . सेहत और जनजीवन से खिलवाड़ के मामलों में सरकार और उसका विभाग कितना गंभीर है इसका खुलासा भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने कर दिया है। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत जितने मामले सामने आए उनमें सरकार ने अपील करने तक की जहमत नहीं उठाई। ग्वालियर, मुरैना, सतना, भोपाल, इंदौर, होशंगाबाद, उज्जैन और खरगोन जिलों में से पांच जिलों में 217 गंभीर प्रकरण थे। बावजूद इसके अपील नहीं की गई। तीन जिलों ने तो ऑडिटर को जानकारी तक नहीं दी। ग्वालियर, मुरैना, भोपाल, इंदौर, होशंगाबाद, उज्जैन और खरगोन में ही इन वर्षों में लंबित अपील प्रकरणों में 416 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
प्रदेश के आठ जिलों पर आधारित खाद्य सुरक्षा के मामलों में सरकार और उसके लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को कठघरे में खड़ा करती है। प्रदेश में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन को लेकर सामान्य एवं सामाजिक क्षेत्र पर तैयार 2021 की यह रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई है। लेखापरीक्षा के अनुसार फरवरी 2020 की स्थिति में ग्वालियर, मुरैना, सतना, भोपाल, इंदौर, होशंगाबाद, उज्जैन और खरगोन में 11851 लाइसेंस और 52266 रजिस्टे्रशन की वैधता समाप्त हो गई थी। इसके बाद भी यह कारोबार करते रहे और इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।
CAG of India
CAG of India office in Gwalior
प्रकरण पेश करने में 35 महीने तक विलंब
ग्वालियर, मुरैना, भोपाल, इंदौर, उज्जैन और खरगोन जिलों में रिपोर्ट आने में 286 दिन तक की देरी हुई। ग्वालियर, मुरैना, भोपाल, इंदौर, होशंगाबाद, उज्जैन और खरगोन में 1800 मामलों में से 814 मामले अदालत में 35 माह तक की देरी से पेश किए गए। इनमें से 65 मामले एक साल से अधिक विलंब से पेश किए गए। इस देरी के लिए कलेक्टर की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन इस अनुमति का प्रमाण लेखापरीक्षा को नहीं दिया गया।
अलग से अधिकरण और न्यायालय स्थापित नहीं
सरकार की मंशा पर अपील प्रकरणों के आधार पर सवाल उठता है। दरअसल, 2011 से 13 के बीच उच्च न्यायालय में केवल 60 प्रकरणों में अपील की गई। यही नहीं 2014 से 19 के दौरान जिलावार अपील प्रकरणों का रिकॉर्ड तक है। सरकार ने खाद्य सुरक्षा अपील प्रकरणों के लिए अलग से अधिकरण और न्यायालय की स्थापना तक नहीं की। एजी की रिपोर्ट तैयार होने तक विशेष न्यायालयों के गठन का प्रस्ताव विधि विभाग को भेजने की प्रक्रिया ही चल रही थी।
न जांच रिपोर्ट आने का समय तय, न प्रकरण पेश करने का
प्रदेश में खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला से सैंपल की जांच रिपोर्ट भेजने की कोई समयसीमा नहीं है। इसी तरह अमानक रिपोर्ट पर प्रकरण न्यायालय में पेश करने का समय भी तय नहीं है। इसकी वजह से अभियोजन में देरी हो रही है।
पांच साल में फूड पॉइजनिंग के शिकार हुए 3169 लोग
फूड पॉइजनिंग के 3169 मामले 2014 से पांच साल में सामने आए। ग्वालियर में 460, इंदौर में 1908, खरगोन में 108, उज्जैन में 574 और होशंगाबाद में 119 मामले थे। इनमें होशंगाबाद जिले के 110 मामले तो बाबई में शुक्करवाड़ा सरकारी विद्यालय के ही थे। यहां विषाक्त मध्यान्ह भोजन से विद्यार्थी बीमार हुए थे। इस तरह के मामलों में सबसे बड़ी दुविधा पंजीकृत चिकित्सक नहीं होना है। इन चिकित्सकों को अधिसूचित करने का प्रस्ताव जुलाई 2020 में भारतीय खाद्य संरक्षा एएवं मानक प्राधिकरण को भेजा गया।
इन खामियों का भी रिपोर्ट में जिक्र

  • खाद्य विभाग में 771 पदों की आवश्यकता थी, लेकिन सिर्फ 424 पद यानी 55 प्रतिशत को ही स्वीकृत किया गया
  • फरवरी 20 की स्थिति में स्वीकृत पदों में सिर्फ 165 ही भरे थे, जबकि 259 पद (61 प्रतिशत) खाली पड़े थे।
  • औद्योगिक इकाइयों और खाद्य कारोबारियों का सर्वे नहीं किया। इसलिए ये कानून के दायरे में नहीं आ सके।
  • खाद्य लाइसेंस और पंजीयन का डेटा नहीं होने से इनके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकी।
  • मुखबिरों को इनाम देने के लिए निर्धारित कोष का गठन नहीं किया गया।
    बजट के बड़े हिस्से का उपयोग तक नहीं
    पांच साल में विभाग को 88 करोड़ से अधिक बजट मिला, लेकिन इसमें से महज 53 करोड़ 34 लाख ही खर्च किया गया। इसको माना गया कि खाद्य सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता में नही है। यही वजह है कि उपकरणों के 1 करोड़, फूड लैब की मशीनों और उनके रखरखाव के 9 करोड़ और अन्य सामग्री के 50 लाख रुपए खर्च ही नहीं किए गए।
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प्रदेश के इन्हीं आठ जिलों को ऑडिट के लिए इसलिए चुना
इंदौर, भोपाल, उज्जैन : खाद्य कारोबारियों की अधिकतम संख्या और दुग्ध उत्पादन के आधार पर
होशंगाबाद, सतना, खरगोन : धार्मिक महत्व के स्थलों पर खाद्य विक्रेताओं की संख्या के आधार पर
ग्वालियर और मुरैना : मीडिया रिपोर्ट में दुग्ध उत्पादों में मिलावट के अत्याधिक जोखिम के आधार पर
(इन जिलों में संबंधित विभागों और न्यायालयीन प्रकरणों के दस्तावेज की जांच की गई)

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