script'Chhath Puja' is the festival of love for nature | प्रकृति के प्रति प्रेम का पर्व है 'छठ पूजा', 36 घंटे तक रखा जाता है कठोर निर्जला व्रत | Patrika News

प्रकृति के प्रति प्रेम का पर्व है 'छठ पूजा', 36 घंटे तक रखा जाता है कठोर निर्जला व्रत


पूजा पाठ से लेकर प्रसाद तक में प्रकृति की चीजों का ही उपयोग......

ग्वालियर

Published: November 08, 2021 04:59:22 pm

ग्वालियर। भगवान सूर्य की उपासना का छठ पूजा पर्व शुरु हो गया है। छठ पूजा का पर्व 4 दिन तक चलेगा। मान्यता है कि छठ पर्व में सूर्य उपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती हैं परिवार में सुख शांति और धन धान्य से परिपूर्ण करती हैं। इस दिन व्रती स्नान आदि कर नए वस्त्र धारण करते हैं और शाकाहारी भोजन लेते हैं।

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Chhath Puja

ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश सोनी के अनुसार सूर्य देव की आराधना का यह पर्व साल में दो बार आता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को यह छठ पर्व मनाया जाता है। इस बार छठ पर्व का प्रारंभ 8 नवंबर यानी आज से शुरू हो चुका है। इसके अगले दिन 9 नवंबर को खरना करके व्रत शुरू किया जाएगा। 10 नवंबर बुधवार को छठ व्रत का मुख्य पूजन होगा। इसके अगले दिन सप्तमी 11 नवंबर को सुबह सूर्योदय के समय जल देकर छठ पर्व का समापन होगा।

36 घंटों का रखा जाता है व्रत

छठ व्रत धारी लगातार 36 घंटों का कठोर व्रत रखते हैं। पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाए खाए के साथ मनाया जाता है। बांस की टोकरी में सूप रखकर अस्ताचल सूर्य को पानी में खड़े होकर जल दिया जाता है।

प्रकृति की चाजों का ही उपयोग

छठ को प्रकृति का सौंदर्य भी कहा जाता है। इसमें पूजा पाठ से लेकर प्रसाद तक में प्रकृति की चीजों का ही उपयोग किया जाता है। पूजा में मौसमी फल तथा फसलों को ही शामिल किया जाता है। नई फसल के साथ गन्ना चढ़ाया जाता है। और गुड़ को आटे में मिलाकर ठेकुआ बनाए जाते हैं। सूर्य के अर्ध्य के समय बांस से बने सूप का उपयोग किया जाता है। सूप से वंश की वृद्धि होती है तथा वंश की रक्षा होती है। गन्ना आरोग्यता का कारक है। ठेकुआ समृद्धि का कारक है।

महाभारत काल में कर्ण से जुड़ी है छठ की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की क्योंकि कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। उनकी कृपा से ही वह महान योद्धा बने, इसीलिए आज भी छठ पर्व पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।

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