पुरखों की याद में श्मशान को संवारा, बना मॉर्निंग वॉक और घूमने का प्वॉइंट

श्मशान का नाम सुनकर अच्छे, अच्छों का पसीना छूट जाता है। यह कहा जाए कि मुक्तिधाम मार्निंग वॉक, परिवार सहित घूमने का प्वॉइंट भी है तो बात सुनने में अजीब लगेगी, लेकिन उतनी ही सच है। शहर के सबसे बड़े लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम परिसर में बने मराठा समाज के मुक्तिधाम को लोगों ने अपनी मेहनत के बूते पर कुछ इसी क्लेवर में संवारा है।

ग्वालियर. श्मशान का नाम सुनकर अच्छे, अच्छों का पसीना छूट जाता है। यह कहा जाए कि मुक्तिधाम मार्निंग वॉक, परिवार सहित घूमने का प्वॉइंट भी है तो बात सुनने में अजीब लगेगी, लेकिन उतनी ही सच है। शहर के सबसे बड़े लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम परिसर में बने मराठा समाज के मुक्तिधाम को लोगों ने अपनी मेहनत के बूते पर कुछ इसी क्लेवर में संवारा है। श्मशान को सुंदर बनाने का बीड़ा करीब छह साल पहले शुरू हुआ। कांग्रेस नेता बालखाण्डे बताते हैं कि 8 साल पहले इस मुक्तिधाम पर कब्जे की कोशिश हुई थी। कुछ लोगों ने दीवार तोड़कर यहां ईंट भट्टे लगाने की कोशिश की। यह जगह शराब, स्मैक के शौकीनों का अड्डा बन गई थी। माजरा सामने आया तो हितचिंतकारणी सभा ने मुक्तिधाम को सुरक्षित करने की प्लानिंग की। तब उन्हें यह जिम्मा दिया। बालखाण्डे कहते हैं कि उनकी प्लानिंग माता पिता की याद में श्रेगांव में दो कमरों का निर्माण करना था। उसी दौरान मुक्तिधाम को सुरक्षित करने का जिम्मेदारी संभाली तो सोचा कि जो निर्माण कार्य में लगाएंगे, उसे मुक्तिधाम को संवारे में लगाया जाए तो बेहतर होगा।

बालखाण्डे ने बताया कि बचत पूंजी 4.5 लाख रुपए से मुक्तिधाम के निर्माण का काम शुरु किया, जब लोगों को पता चला तो समाज के करीब 60-70 लोग आगे आए। लोगों ने 5 हजार से दो लाख तक की मदद की। करीब 60 लाख रुपएसे ज्यादा कलेक्शन हुआ। उसमें मुक्तिधाम के निर्माण की शुरुआत की। उसका परिणाम है कि वर्तमान यह मुक्तिधाम पूरे देश में ऐसा श्मशान है, जहां परिवार के साथ लोग आकर बैठते हैं। समय बिताते हैं। अंतिम संस्कार के साथ जगह घूमने का स्थान बन गई है। फब्बारे लगाए गए हैं।

यह एक्टिविटी होती हैं

मुक्तिधाम में आमतौर पर महिलाएं बच्चे नहीं आते हैं, लेकिन मराठा समाज के मुक्तिधाम का स्वरूप बदलने से लोगों के विचार भी बदल गए हैं। यहां लोग परिवार के साथ आते हैं। रविवार सुबह समाज के लोगों की बैठक होती है। मुक्तिधाम को संवारने के कोई लेबर नहीं लगाई जाती, लोग खुद स्वंयसेवक के तौर पर बगीचे की देखभाल, पक्षियों के पिंजरों की सफाई, मुक्तिधाम की सफाई करते हैं। सप्ताह में एक दिन लोग पांच पेड़ जरूर लगाते हैं।

मुक्तिधाम में पूजा पाठ

नरक चौदस, होली पर समाज के लोग मुक्तिधाम में जाकर पुरखों को याद कर फिर त्यौहार की शुरुआत करते हैं। बालखाण्डे बताते हैं कि पुरखों की स्मृति की इस परिपाटी आने वाली पीढि को भी सीख दे रही है।

Harish kushwah Desk
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