अरबों का राशि की विकास के नाम चढ़ोतरी, फिर भी विकास दिखता नहीं

पीने का पानी हो या सड़क, चाहे बिजली हो या फिर रोजगार की समस्या, किसी भी मोर्चे पर न तो प्रशासन खरा उतर सका और न शासन के प्रतिनिधि आम जन की परेशानियों

By: Gaurav Sen

Published: 12 Nov 2017, 11:42 AM IST

ग्वालियर। 712 गांवों की लगभग 5 लाख, नगर निगम की लगभग १३ लाख और नगरीय निकायों की लगभग 2 लाख जनसंख्या को मूलभूत सुविधाओं पर हर साल 2 से 3 अरब रुपए की राशि खर्च करने के बाद भी लोग त्रस्त हैं। पीने का पानी हो या सड़क, चाहे बिजली हो या फिर रोजगार की समस्या, किसी भी मोर्चे पर न तो प्रशासन खरा उतर सका और न शासन के प्रतिनिधि आम जन की परेशानियों को दूर करने में सफल हो सके हैं।


स्थिति यह है कि अकेले ग्रामीण विकास विभाग में 75 करोड़ रुपए से अधिक की योजनाओं का संचालन हो रहा है, लेकिन इसमें से वास्तविक हितग्राही बमुश्किल 30 फीसदी राशि पहुंच रही है, बाकी की राशि जिला, जनपद, आरईएस और पंचायत में नियुक्त कर्मियों के जरिए चरणबद्ध तरीके से खप रही है।

 

शिक्षा

96 हजार 770 बच्चों की गणवेश के लिए 400 रुपए के मान से राशि स्वीकृत हुई।
3 करोड़ 87 लाख 8 हजार रुपए गणवेश के लिए पीटीएम के खाते में जमा की गई।
1831 स्कूलों में 3832 वालंटियर्स ने पंजीयन कराया था।

 

परिणाम
स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति 30 से 40 फीसदी तक सिमटकर ।
स्कूलों में शिक्षा का स्तर घटिया है। शिक्षक पढ़ाने की बजाय नेताओं की चापलूसी करने में लगे ।
95 फीसदी शिक्षक अपने बच्चों को निजी स्कूलों मेंं पढ़ा रहे हैं।

 

बिजली
4 लाख 81 हजार 538 निम्न दाब उपभोक्ता हैं ग्वालियर के चारों संभाग में ।
आरजीजीवीवाय, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति, फीडर सेप्रेशन, योजनाओं में 160 करोड़ के हो रहे काम।ग्रामीण क्षेत्र के डबरा में 57 हजार 598 निम्न दाब उपभोक्ता हैं।


परिणाम
घाटीगांव-भितरवार के 40 से अधिक गांवों में बिजली के लिए परेशान हैं।
डबरा क्षेत्र के गांवों में बमुश्किल 8 घंटे बिजली दी जा रही है।
शहरी क्षेत्र के पॉश एरिया में भी हर घंटे बिजली ट्रिप हो रही है, निचली बस्तियों में स्थिति बेहद खराब है।

 

 

 

मिड-डे मील
4 लाख 83 हजार रुपए का खर्च प्रतिदिन लगभग मध्याह्न भोजन पर किया जा रहा है।
1659मीट्रिक टन खाद्यान्न प्राइमरी और 1200 मीट्रिक टन खाद्यान्न मिडिल स्कूल के लिए आवंटित

परिणाम
शिक्षा के साथ पोषण देने की इस योजना पर लालच का ग्रहण लग गया है।
जनप्रतिनिधि और अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे स्व-सहायता समूह सिर्फ पैसा कमाने का साधन बने।

 

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क
68 करोड़ रुपए लगभग की लागत से गांव की सड़कें जिले में बनी हैं।
13 करोड़ 44 लाख रुपए में बनाई जा चुकी है इससे पहले मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना में

परिणाम
नई सड़कों को छोड़ ज्यादातर गांवों की सड़कें उखड़ गई हैं।
मुख्यमंत्री सड़कों के नाम पर ठेकेदारों ने मिट्टी डालकर छोड़ दिया गया है। अधिकत सड़कें खराब।
जांच हो तो 95 फीसदी कामों के मूल्यांकन में इंजीनियरों की भूमिका सवालों के घेरे में रहेगी।


पेयजल
6852 हैंडपंप,147 नलजल योजनाएं पानी के लिए पीएचई के कागजों में चालू हैं।
5 करोड़ रुपए से अधिक का व्यय अधिकारियों ने पानी के इंतजामों पर कर दिया है।


परिणाम
जिले की 300 चिह्नित बस्तियों सहित 60 फीसदी से अधिक गांव और शहरी क्षेत्र में जल संकट है।
पीएचई के अधिकारी प्रत्येक जियोस बैठक में कलेक्टर सहित अन्य जनप्रतिनिधियों को गुमराह कर रहे हैं।


जल संरक्षण
भू-जल संरक्षण और संवर्धन के लिए जिले में 28 वाटरशैड 2009 और 6 परियोजनाएं 2015 तक जारी रहीं ।
7 करोड़ 98 लाख रुपए पुरानी परियोजनाओं और नई योजनाओं पर 18 करोड़ रुपए खर्च किए।


परिणाम
वाटरशैड के माध्यम से जिले में एक भी जल संरचना नहीं है।
भू-जल संरक्षण के नाम पर 70 फीसदी से अधिक राशि का गोलमाल किया गया है।
40 से अधिक शिकायतों के बाद भी प्रशासनिक जांच पूरी नहीं हो पाईं।

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