ची-चीं कर अंडों के शैल तोड़कर बाहर की दुनिया में आए घडिय़ाल के बच्चे, ऐसे निकले 

  ची-चीं कर अंडों के शैल तोड़कर बाहर की दुनिया में आए घडिय़ाल के बच्चे, ऐसे निकले 
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विलुप्त होती जलीय जीव प्रजाति घडिय़ाल को संरक्षित किए जाने के लिए राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य की टीम ने पिछले दिनों चंबल के घाटों से 200 घडिय़ाल के अंडे और 100 कछुए के अंडे एकत्रित किए थे। 

ग्वालियर। विलुप्त होती जलीय जीव प्रजाति घडिय़ाल को संरक्षित किए जाने के लिए राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य की टीम ने पिछले दिनों चंबल के घाटों से 200 घडिय़ाल के अंडे और 100 कछुए के अंडे एकत्रित किए थे। जिन्हें चंबल के किनारे बने देवरी घडिय़ाल सेंटर के हेचिंग चेंबर में रखा गया था। देवरी घडिय़ाल सेंटर के हेचिंग चेंबर से ची-चीं की आवाजें सुनते ही केयर टेकर दौड़ कर वहां पहुंचा और चरमराते अंडों को देख केयर टेकर समझ गया कि मदर कॉल आ गई है। अब बच्चें अंडों से निकलने ही वाले हैं।

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अंडों को तत्काल निकाल कर सावधानी से हेचिंग चेंबर की रेत से बाहर निकाला और कुछ ही मिनट में चिकिंग नोइस के साथ घडिय़ाल के बच्चे अंडों के शैल तोड़कर बाहर की दुनिया में आ गए। 



अभी हाल ही के दिनों में मुरैना के पास देवरी घडिय़ाल सेंक्चुरी में इस दुर्लभ प्रजाति के 200 में से करीब१०० अंडों से बच्चे निकल आए है। दुर्लभ जलीय प्रजाति में शामिल घडिय़ाल सबसे ज्यादा चंबल नदी में पाए जाते हैं। नदी में इस समय करीब १३०० घडिय़ाल हैं, और इनका कुनबा लगातार बढ़ाए जाने की कोशिशें जारी हैं। 

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इस दुर्लभ प्रजाति को बचाने और इनकी संख्या बढ़ाने मुरैना के देवरी घडिय़ाल सेंटर में नदी किनारे मिले अंडों को लाकर प्राकृतिक हेचिंग की जाती है। हर साल करीब 200 अंडे इस सेंटर में लाए जाते हैं। 


दरअसल मादा घडिय़ाल हर साल नदी में हजारों अंडे देती है,लेकिन इसमें से जन्में ८० फीसदी बच्चे पानी के बहाव में बहकर मर जाते हैं। कुछ अंडों को दूसरे जानवर खा जाते हैं, इसलिए अंडों को देवरी सेंटर पर लाकर निगरानी में रख कर हेचिंग की जाती है।




65 दिन बाद निकलते हैं बच्चे

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मादा घडिय़ाल फरवरी-मार्च  में चंबल किनारे रेत में अंडे देती है। इनमें से कुछ अंडों को देवरी सेंटर लाकर 30 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर रेत में दबाकर रखा जाता है। अंडों की हेचिंग पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से कराई जाती है और 65 दिन बाद अंडों से बच्चे निकलते हैं।



"इस बार चंबल के घाटों से हमने 200 घडिय़ाल और कछुए के अंडे एकत्रित किए हैं। इनकी देवरी पर हैचरिंग कराई जा रही है और बच्चे भी निकलने लगे हैं।"
ज्योति डंडोतिया, केयर टेकर, घडिय़ाल केंद्र देवरी मुरैना

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