अपनों से ठुकराए बुजुर्गों को अपनेपन का अहसास कराकर दे रहे खुशी

उम्र के आखिरी पड़ाव पर अपनों से ठुकराए बुजुर्गों के चेहरे पर खुशी, हंसी आ जाए तो इनकी देखभाल करने वालों की थकान मिट जाती है। बेटे, बहू और नाती, नातिनों का परिवार होने के बावजूद उनसे तिरस्कृत यह बुजुर्ग स्वस्थ और मस्त रहें, इसलिए कुछ समाजसेवियों की टीम इसमें जुटी है।

By: Harish kushwah

Published: 07 Mar 2020, 12:19 AM IST

ग्वालियर. उम्र के आखिरी पड़ाव पर अपनों से ठुकराए बुजुर्गों के चेहरे पर खुशी, हंसी आ जाए तो इनकी देखभाल करने वालों की थकान मिट जाती है। बेटे, बहू और नाती, नातिनों का परिवार होने के बावजूद उनसे तिरस्कृत यह बुजुर्ग स्वस्थ और मस्त रहें, इसलिए कुछ समाजसेवियों की टीम इसमें जुटी है। लक्ष्मीगंज जागृति नगर में स्थिति नारायण वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों को खुश रखने के प्रयास में जुटीं समाजसेवी इंद्रा मंगल बताती हैं कि आश्रम में 40 से ज्यादा बुजुर्ग हैं। इनमें कुछ को छोड़ दें तो ज्यादातर संपन्न परिवारों से हैं। लेकिन परिवार में आपसी तालमेल नहीं हो पाने से इन बुजुर्गों को घर से बाहर कर दिया है। अब इनके लिए गैर ही अपने हैं, इसलिए उन्हें खुश रखने का फर्ज उन लोगों का है जिनका इनसे खून का नहीं इंसानियत का रिश्ता है।

इंद्रा बताती हैं कि आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग बीते दिनों की याद कर व्यथित नहीं हों, उनकी जिंदगी में खुशी रहे, इसलिए टीम वृद्धाश्रम में जाकर इन लोगों के साथ खेलती है, उनका मनोरंजन करती है। उनकी उम्र के हिसाब से खेल कूद प्रतियोगिताएं कराती है। उसमें जो विजेता होता है, उसे इनाम भी दिया जाता है। इससे इन बुजुर्गों को महसूस होता है कि अपनों ने भले ही उन्हें कमजोर समझकर छोड़ दिया हो, लेकिन उनमें कुछ कर दिखाने का जज्बा बरकरार है। इसलिए टीम के सदस्य मंजुला सिंघल, डॉ.रमेश शर्मा, आरती खेड़कर सहित सभी सदस्य इन बुजुर्गों को खुश रखने के लिए नियमित समय निकालते हैं।

बुजुर्गों की बनाएंगे टीम

बेसहारा बुजुर्गों के अपने बनकर उन्हें खुश रखने वाली टीम के सदस्य कहते हैं कि इन बुजुर्गों को तो पारिवारिक कारणों की वजह से परिवार से दूर होना पड़ा है, लेकिन ऐसे तमाम लोग हैं जिनके बच्चे नौकरी और काम की तलाश में शहर और देश के बाहर हैं। ऐसे लोग अपनों के होते हुए भी बेसहारा हैं, इसलिए ऐसे लोगों का ग्रुप बनाया जा रहा है जो जिंदगी के अंतिम पड़ाव में अकेले हैं। यह सभी लोग आपस में एक दूसरे से वाट्सऐप पर जुड़ेंगे और एक दूसरे से सतत संपर्क में रहेंगे। कोशिश रहेगी कि ग्रुप के सदस्य एक दूसरे से लगभग एक दिन मुलाकात करें। अगर किसी दिन कोई सदस्य संपर्क नहीं कर सका, तो टीम उसे गंभीरता से लेकर उसके घर जाकर मुलाकात नहीं करने की वजह जानेगी। इससे यह होगा कि बच्चों के बाहर रहने के बावजूद बुजुर्ग हमउम्रों की देखभाल कर सकेंगे।

Harish kushwah
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