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सरकार का ग्रीन बिल्डिंग पर जोर, लेकिन नगर निगम में इसके विशेषज्ञ नहीं

ऊर्जा संरक्षण के लिए केन्द्र सरकार देश में ग्रीन बिङ्क्षल्डग पॉलिसी लागू करने जा रही है। प्रदेश में भी नए भूमि विकास नियमों में ग्रीन बिङ्क्षल्डग प्रावधान शामिल किए जा...

ग्वालियर

Published: September 19, 2022 06:28:08 pm

ग्वालियर. ऊर्जा संरक्षण के लिए केन्द्र सरकार देश में ग्रीन बिङ्क्षल्डग पॉलिसी लागू करने जा रही है। प्रदेश में भी नए भूमि विकास नियमों में ग्रीन बिङ्क्षल्डग प्रावधान शामिल किए जा रहे हैं। अगर हमारे शहर में ग्रीन बिङ्क्षल्डग कांसेप्ट लागू होता है तो नगर निगम और पीडब्ल्यूडी में इसके विशेषज्ञ नहीं होने से यह कैसे कार्यान्वित होगा, यह बड़ा सवाल है। शहर में कुछ बड़े भवन इस कांसेप्ट पर बनाए भी जा रहे हैं। इसके लिए निजी कंसलटेंट व आर्किटेक्ट पर लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। यह प्रोजेक्ट की लागत का एक फीसदी तक फीस लेते हैं। शहर में अभी 200 से अधिक बड़े भवनों के साथ करीब 50 हजार छोटे-बड़े आवासों का निर्माण हो रहा है। इनके लिए नगर निगम की भवन अनुज्ञा शाखा अथवा आर्किटेक्ट डिजाइन तय करते हैं। हालांकि, स्थिति यह है कि 60 फीसदी मंजूर डिजाइन का उल्लंघन होता है। इसकी मुख्य बड़ी वजह निगम के इंजीनियर का तकनीकी तौर पर दक्ष नहीं होना है। ऐसे में यदि नगर निगम में ग्रीन बिङ्क्षल्डग प्रावधान लागू होते हैं, तो जमीनी स्तर पर लागू करना काफी मुश्किल होगा।
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सरकार का ग्रीन बिल्डिंग पर जोर, लेकिन नगर निगम में इसके विशेषज्ञ नहीं

इंजीनियरों को दिया जाना चाहिए प्रशिक्षण
एमआइटीएस के सिविल एक्सपर्ट प्रोफेसर मनोज कुमार ने बताया कि नगर निगम सहित सभी सरकारी निर्माण एजेंसियोंं को समय-समय पर अपने इंजीनियरों को प्रशिक्षण दिलाया जाना चाहिए। ग्रीन बिङ्क्षल्डग में कुछ नए पॉइंट शामिल होते हैं, इसलिए उनका ध्यान रखना चाहिए। ग्रीन बिङ्क्षल्डग के लिए प्रशिक्षण से प्रशिक्षित इंजीनियर तैयार किए जा सकते हैं।

अभी निगम की स्थिति
नगर निगम के इंजीनियर सिविल के एक्सपर्ट होते हैं। वर्तमान में इन्हीं को जोनवार भवन अनुज्ञा का जिम्मा दिया गया है। वहीं प्लाङ्क्षनग की बात करें तो टाउन एंड कंट्री प्लाङ्क्षनग में सिर्फ चीफ सिटी प्लानर ही होता है, बाकी भाग निगम में नहीं होता। हालांकि अभी सिटी प्लानर भी नहीं है और चार्ज देकर ही काम चलाया जा रहा। अभी ग्रीन बिङ्क्षल्डग के तहत सिर्फ नियमों में 1500 वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल वाले भवन में वाटर हार्वेङ्क्षस्टग अनिवार्य है, लेकिन यह भी जिम्मेदार लागू नहीं करवा पा रहे हैं।

जरूरी हैं जानकार इंजीनियर का होना
बड़े भवन मालिक ऊर्जा संरक्षण के तहत खुद ग्रीन कांसेप्ट से तैयार करवा रहे हैं। ऐसे में इनकी अनुमति के लिए मॉनिटङ्क्षरग करने के लिए निगम के इंजीनियरों को भी ग्रीन बिङ्क्षल्डग कांसेप्ट की जानकारी होना जरूरी है। लेकिन उनके पास कोई जानकारी नहीं है।

निगम के पास नहीं हैं इंजीनियर
नगर निगम में स्ट्रक्चर इंजीनियर नहीं हैं, सिटी प्लानर नहीं हैं, आर्केटेक्टि नहीं हैं, कोई विशेषज्ञ नहीं हैं, सरचंना विशेषज्ञ इंजीनियर व फायर विशेषज्ञ अधिकारी भी नहीं है।

योग्यता नहीं फिर भी दे दिया चार्ज
जोन -19 सतेंद्र सोलंकी, जोन-11 अनिल श्रीवास्तव, जोन-8 अजय शर्मा सब इंजीनियर नहीं हैं, फिर भी इन्हें चार्ज दे रखा है। यह निर्माण कार्य की मेजरमेंट बुक में माप दर्ज नहीं कर सकते हैं।

ग्रीन बिङ्क्षल्डग में यह है अहम
- वाटर हार्वेङ्क्षस्टग।
- सूरज की रोशनी घर के हर क्षेत्र में पहुंचे।
- दीवारों की डिजाइन।
- निर्माण सामग्री में बदलाव।
- रंगाई पुताई भी शामिल।
- आवास को ठंडा-गरम रखने की जियोथर्मल हाइड्रो तकनीक।

जल्द प्रशिक्षण करवाया जाएगा
भवन निर्माण की नई तकनीक के लिए हम समय-समय पर अपने इंजीनियरों को अलग-अलग वर्कशॉप में भेजते रहते हैं। यदि ग्रीन बिङ्क्षल्डग के नए प्रावधान होते हैं तो सभी को जल्द ही प्रशिक्षण भी करवाया जाएगा।
किशोर कान्याल, आयुक्त नगर निगम

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