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हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा कि 'छड़ी पड़े छमाछम, विद्या आए धमाधम'

locationग्वालियरPublished: Jan 27, 2024 01:15:20 pm

Submitted by:

Manish Gite

शारीरिक दंड बच्चे में सुधार का तरीका था... हाईकोर्ट ने प्राचार्य व शिक्षकों के खिलाफ दर्ज आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के मामले में कहा, एफआइआर निरस्त कर कहा, मृतक के परिवार के दर्द की पीड़ा के लिए दूसरों को दंडित नहीं किया जा सकता

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कोर्ट ने बच्चे को शारीरिक दंड देने के मामले में एफआईआर निरस्त की।

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने टेकनपुर के विवेकानंद स्कूल के प्राचार्य व शिक्षकों के खिलाफ धारा 306 के केस को निरस्त करते हुए कहा कि छड़ी पड़े छमाछम, विद्या आए धमाधम... स्कूल व गुरुकुल में इस तरह का शारीरिक दंड बच्चे में सुधार का तरीका था। शिक्षक इस तरीकों को सुधार का एक मात्र तरीका मानते थे। आज समय के साथ तरीके और कई चीजें बदली हैं। किशोर न्याय अधिनियम 2015 ने शारीरिक दंड पर रोक लगा दी है। मृतक बच्चे के परिवार को पीड़ा हुई है, लेकिन इस पीड़ा के बदले में दूसरों को दंडित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने प्राचार्या व शिक्षकों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। जस्टिस आनंद पाठक ने यह आदेश दिया है।

क्या है मामला

-दरअसल बिलौआ थाने में 4 नवंबर 2022 को विवेकानंद स्कूल के प्राचार्य वीरेंद्र सिंह, उप प्राचार्य शंभूनाथ, शिक्षक शिल्पी सोलंकी पर 12 वीं छात्र को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का केस दर्ज हुआ था। तीनों के ऊपर आरोप था कि छात्र को प्रताडि़त किया, जिसके चलते उसने आत्महत्या कर ली।


- हाईकोर्ट में प्राचार्य, उप प्राचार्य, शिक्षक की ओर से तर्क दिया कि मृतक छात्र काफी शरारती था, वह स्कूल में पटाखा लेकर आया और दोस्तों के साथ बाथरूम में पटाखा चला दिया। जिससे दीवार चटक गई। छात्र को बुलाकर कहा कि अपने माता-पिता को लेकर आएं, वह स्कूल में क्या शरारत करता है, उससे अवगत कराया जाएगा। सिर्फ इतनी बात छात्र से कही थी। सीसीटीवी फुटेज भी पेश किए। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ऐसा कोई आरोप नहीं दिख रहा है, जिससे छात्र आत्महत्या जैसा कदम उठा सके। इसलिए केस चलने लायक नहीं है।

आत्महत्या के लिए तीन तथ्य होना जरूरी

1- आत्म हत्या के लिए उकसाना
2- व्यक्ति को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की साजिश
3- जानबूझकर किसी कार्य या चूक के लिए आत्महत्या में सहायता करना।
4- कोर्ट ने कहा कि इस केस में तीनों बातों में एक भी बात शामिल नहीं है। इसलिए केस में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
5- आईपीसी में उकसाने वाले शब्द को परिभाषित नहीं किया है। दोषी ठहराने के लिए प्रत्यक्ष व सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

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