शारीरिक अक्षमता से नहीं मानी हार

किसी ने सही कहा है कि आसमान में भी छेद हो सकता है लेकिन जरूरत है कि एक पत्थर को आसमान में उछाला तो जाए। फिर सपने तो सभी देखते हैं लेकिन सपने उन्हीं के पूरे होते हैं जिनके सपनों में जान होती है। एक सपना देखा आशीष शिवहरे ने। सपना था तैराक बनकर नाम रोशन करने का। लेकिन यह सपना इतना आसान नहीं था, कारण था कि बचपन में पोलियो के कारण पैर और एक हाथ खराब हो चुका था। लेकिन आशीष ने इसका अफसोस करने के बजाए उसे अपनी शक्ति बनाया और पूरी मेहनत के साथ तैराकी सीखी। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि नेशनल, स्टेट और संभागीय स्तरीय प्रतियोगिताओं में गोल्ड सहित कई मेडल अपने नाम कर चुके हैं।

By: Vikash Tripathi

Published: 03 Mar 2019, 07:59 PM IST

8 महीने की उम्र में आई समस्या
आशीश शिवहरे का जन्म 1997 में हुआ। जन्म के आठवें महीने पर पोलियो की बीमारी ने चपेट में ले लिया। जिससे उनके दोनों पैर और एक हाथ बेकार हो गया। जब बड़े हुए तो चल ही नहीं पाते थे। इस स्थिति को देखकर काफी परेशान हुए। लेकिन इस परेशानी से कभी वह निराश नहीं हुए। उन्होंने हमेशा अपने होसलों को बुलंद रखा। उन्हें पता चला कि अमर ज्योति स्कूल में एक्वा थेरेपी कराई जाती है तो उन्होंने यहां एडमिशन लिया और थैरेपी शुरू हुई। शुरूआत में तो तैराकी थैरेपी के लिए सीखते थे। बाद में उन्होंने बतौर तैराक इसे सीखना शुरू किया। तैराकी की शुरूआत १९९७ में की गई। बिना किसी सहायता के वह आगे बढ़ते गए और पदक हासिल किए। अभी तक उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया और मेडल जीते। अशीष को अभी तक १० गोल्ड, १३ सिल्वर और ७ ब्रांज मेडल मिल चुके हैं। आशीष का सपना यहीं तक नहीं है बल्कि वह चाहते हैं कि वह देश के लिए गोल्ड लेकर आएं। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वह इस दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। आशीष के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्र्रतियोगिता में शामिल होने के लिए २ से ३ लाख की जरूरत होती है और वह उनके पास नहीं है। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी है। उनके अनुसार वह तैयारी कर रहे हैं कभी तो मौका मिलेगा ही।
दूसरों के लिए बनना है मिशाल
आशीष के अनुसार शुरू में बहुत मुश्किलों का सामना किया। चलने में होने वाली तकलीफ और आर्थिक तंगी के कारण बारहवीं के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। ऐसा नहीं कि वह पढऩा नहीं चाहते थे लेकिन चलने में होने वाली समस्या के कारण वह पढ़ाई नहीं कर सके। वर्तमान में जब वह किसी प्रतियोगिता में पार्टिसिपेट करने जाते हैं उसमें भी बहुत दिक्कत होती है। वह सामान्य लोगों की तरह नहीं चल सकते। वह बैठकर घसीटकर चलते हैं। ऐसे में बहुत तकलीफ होती है। लेकिन उन्होंने इस तकलीफ को अपने सपना पूरा करने के लिए भुला दिया है। अशीष बताते हैं कि शारीरिक अक्षमता कोई अभिशाप नहीं है बल्कि वह तो आपको और अधिक प्रेरणा देती है। कितनी मुश्किलों का सामना करना होता है आपको वह आपको लडऩा सिखाती है। इससे हमें हारने या निराश होने की जरूरत नहीं है। वह खुद को दूसरों के लिए एक मिशाल बनाना चाहते हैं। इसलिए ही वह अपने सपने को पूरा करने के लिए पूरी मेहनत के साथ लगे हैं। आशीष की मानें तो वह अपने कोच प्रो. एके डबास से बहुत प्रेरित हैं और उन्होंने बहुत मदद की है।
नहीं मिली कोई मदद
अशीष की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। पिता भी कोई नौकरी नहीं करते हैं। ऐसे में घर का खर्च चलाना मुश्किल होता है। आशीष के पास भी कोई नौकरी नहीं है। वह जैसे तैसे अपनी प्रेक्टिस करते हैं। जब कभी प्रतियोगिता में बाहर जाना होता है तब भी उन्हें मुश्किल का सामना करना होता है। उन्हें न तो शासन और न ही किसी संस्था ने कोई मदद की।

Vikash Tripathi
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