एसडीओ ने जांच रिपोर्ट में कहा विवादित जमीन सरकारी, जमीन पर दिया जा चुका है मुआवजा

-कलेक्टर एसडीओ की जांच रिपोर्ट पर तीस दिन में करें जिला न्यायालय की जमीन पर फैसला-रिपोर्ट में कहा गया खसरे में कांट-पीट कर गंगाप्रसाद व अन्य का नाम लिखा गया

By: Rajendra Talegaonkar

Published: 27 Nov 2019, 06:12 PM IST

ग्वालियर। सिरोल में सरकारी जमीन की जमकर लूटमार हुई है। जिसकी जैसी रसूख रही उसने यहां उतनी जमीन अपने नाम करा ली है। हाल ही में हाईकोर्ट ने सिरोल एवं आेहदपुर की कई बीघा जमीन को सरकारी घोषित किया है। जिला न्यायालय की जमीन का मामला भी कुछ एेसा ही है। जब उच्च न्यायालय ने इस मामले में की गई गड़बडि़यों को पकड़ा तो जांच रिपोर्ट में यह जमीन सरकारी घोषित हो गई। न्यायालय के समक्ष अनुविभागीय अधिकारी अनिल बनवारिया द्वारा पेश की गई रिपोर्ट को युगलपीठ ने देखने बाद कलेक्टर को आदेश दिया है कि वे तीस दिन में इस मामले का निराकरण करें।


न्यायमूर्ति शील नागु एवं न्यायमूर्ति राजीव कुमार श्रीवास्तव ने रिपोर्ट देखने के बाद उक्त निर्देश दिए। इस मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद कुमार भारद्वाज एवं राजू शर्मा ने तथा शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी ने पैरवी की।
वर्ष २०१३ में दिया जा चुका है मुआवजा
बनवारिया द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया कि यह जमीन जो कि ओहदपुर के सर्वे क्रमांक २७३, २६५ के खसरों के अवलोकन से स्पष्ट है कि इस जमीन कॉलम नंबर सात में हीरालाल के नाम अंकित है। इस प्रविष्टि को सही नहीं माना जा सकता। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि इस जमीन के संबंध में तहसीलदार ने जिसका नाम नहीं दिया गया हैने जांच के बाद गुणदोष के आधार पर इस जमीन को निजी माना। इस जमीन पर कलेक्टर कार्यालय भूअर्जन अधिकारी द्वारा २३ मार्च २०१३को अवार्ड पारित कर जिनके नाम दस्तावेजों में चढ़ाए गए हैं उन्हें मुआवजा भी दिया जा चुका है।
सरकारी जमीन को बेच दिया
जांच रिपोर्ट के अनुसार इस जमीन के कुछ भाग को कैलाश प्रसाद शर्मा के वारिसानने सूर्यप्रकाश शर्मा को बेच दिया। इसे बाद इस जमीन को प्रीति गोयल, नीलम कालरा तथा लीना कालरा एवं ग्वालियर टावर्स को बेचा गया। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी दस्तावेजों में यह जमीन वन विभाग की होना पाई गई है। वन विभाग की जमीन होने पर वनमण्डलाधिकारी से इस जमीन पर रिपोर्ट भी चाही गई। वन मण्डालाधिकारी ने १३ नवंबर १९ को कहा कि तीनों सर्वे की जमीन आरक्षित वन भूमि होकर राजस्व विभाग के अधिपत्य की जमीन है।
पक्का कृषक के अधिकार नहीं मिल सकते
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि इस जमीन पर पक्का कृषकों के अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते। निजी लोगों के नाम इस सरकारी जमीन पर किस अधिकारी के निर्देश पर चढ़ाए गए इसका उल्लेख कहीं नहीं है। खास बात यह है कि एडीजे की जांच रिपोर्ट में कहा गया था कि इस जमीन पर न तो पहले खेती होती थी न अब होती है। जबकि तहसीलदार ने अपने आदेश में कहा था कि यहां खेती होती है, इसलिए पक्का कृषक माना गया था।
बिना आदेश के बदलते रहे भूमि स्वामी
जां रिपोर्ट में कहा गया है कि रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के आधार पर नामांतरण से किसी के स्वत्व का निर्धारण नहीं किया जा सकता। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि वन भूमि पर किसी को भी पक्का कृषक के अध्ािकार नहीं मिल सकते। यह जमीन संवत २००८ में वन विभाग के नाम है। सन् १९५० में खसरा में काट-पीट कर कैलाश प्रसाद व गंगाप्रसाद का नाम लिखा गया। कैलाश प्रसाद को तहसीलीदार ने पक्का कृषक माना। इसके बाद बिना किसी के आदेश के इस सरकारी जमीन को वन विभाग की जमीन लिखना बंद कर दिया गया। जांच रिपोर्ट के अनुसार सन् १९८२ में बिना किसी आदेश के इस जमीन पर शकुंतला देवी आदि को भूमि स्वामी बना दिया गया। यह पूरी प्रविष्टि संदेहास्पद है। इसके बाद भी सभी प्रविष्टियां संदिग्ध हो जाती है।

Rajendra Talegaonkar Desk/Reporting
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