हाईकोर्ट ने दो बर्खास्त कर्मचारियों को नौकरी पर बहाल किए जाने के आदेश

ग्वालियर। उच्च न्यायालय ने कलेक्टर ग्वालियर द्वारा १५ अक्टूबर १४ को बर्खास्त किए गए तृतीय श्रेणी कर्मचारी तथा एसपी ग्वालियर द्वारा १७ अक्टूबर २००६ को बर्खास्त किए गए आरक्षक को फिर से सेवा में लिए जाने के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा इन दोनों ही मामलों में दोनों को सुनवाई का अवसर दिए बिना उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है जोकि न्याय के सिद्धांत के विपरीत है। दोनों इस दौरान के वेतन को प्राप्त करने के हकदार नहीं होंगे।

न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी ने दो अलग-अलग मामलों में यह आदेश दिए हैं। दोनों ही मामलों में याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट डीपी सिंह ने पैरवी की। कलेक्ट्रेट के कर्मचारी निखत खान द्वारा प्रस्तुत याचिका में कहा गया कि उन्हें १९८५ में कापिंग सेक्शन में नियुक्ति प्रदान की गई थी। वे अपनी ड्यूटी को पूरी लगन के साथ कर रहे थे। उन्हें वर्ष २००४ में नियमित कर्मचारी के रुप में निम्न श्रेणी कर्मचारी के पद पर पदस्थ किया गया। दो सौ रुपए मांगे जाने के आरोप में पहले उनकी दो वेतनवृद्धियां रोकी गई फिर जांच के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता डीपी सिंह का कहना था कि उन्हें इससे पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही आरोप पत्र दिया गया। सीधी कार्रवाई कर दी गई। याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का भी कोई अवसर नहीं दिया
गया। न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद निखत खान को बर्खास्त किए जाने के १५ अक्टूबर १४ के आदेश को खारिज करते हुए उन्हें फिर बहाल किए जाने के आदेश दिए हैं।
न्यायालय ने कहा बड़ी सजा दी
न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी ने याचिकाकर्ता बर्खास्त आरक्षक सुनील सिंह तोमर की याचिका को आंशिक रुप से स्वीकार करते हुए उसे बहाल किए जाने के आदेश देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पर जो आरोप लगाए गए हैं उसे देखते हुए उसे अत्यधिक सजा दी गई है। शासन उसके कार्य को लेकर निष्पक्ष जांच करने के लिए स्वतंत्र होगा। यह कार्य उन्हें छह माह में करना होगा।
आरक्षक सुनील सिंह तोमर द्वारा एडवोकेट डीपी सिंह के माध्यम से याचिका प्रस्तुत करते हुए कहा था कि उसे १७ अक्टूबर ०६ को एसपी ग्वालियर द्वारा बर्खास्त कर कर दिया था। इसके खिलाफ की गई अपील को भी विभाग ने खारिज कर दिया
था। तोमर को ७ नवंबर ८३ को यातायात पुलिस में आरक्षक के पद पर भर्ती किया गया था। उसे बिना सूचना के कार्य से अनुपस्थित रहने तथा बीमार होने पर बिना सूचना के तथा बिना मेडिकल प्रस्तुत करने पर बार-बार अनुपस्थित रहने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने हर बार सूचना दी तथा प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत किए गए लेकिन उन्हें सुना ही नहीं गया। न्यायालय ने तोमर की याचिका को आंशिक रुप से स्वीकार करते हुए उक्त आदेश दिए हैं।

Rajendra Talegaonkar Desk/Reporting
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