जिस घर की महिलाओं को दंगल देखना था वर्जित, वहीं रूढि़वादी परम्परा तोड़ रानी ने कुश्ती में पुरुषों को पटका

घुटना खराब होने के बाद भी जीते मेडल, हौसले के आगे हारी बीमारी

By: Mahesh Gupta

Published: 12 Jul 2021, 10:13 AM IST

यदि आपमें कुछ कर गुजरने का जज्बा है तो बाधाएं आपका रास्ता नहीं रोक सकतीं और आप अपने हौसले के दम पर वह कर सकते हैं, जिसके लिए आपने सपने संजोए हैं। ग्वालियर की महिला पहलवान रानी राणा उस घर से हैं, जहां महिलाओं को दंगल देखने की इजाजत नहीं थी। उनकी पांच बुआ ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा, लेकिन रानी कुश्ती लडऩा चाहती थी और उसने अपने सपने को भी सच भी किया। घर में संघर्ष किया, बाहर वालों ने विरोध किया, तो उन्हें बेटी होने की ताकत दिखाई और उसी दंगल में पुरुषों को परास्त किया, जहां महिलाएं देखने जाने से घबराती थीं। इतना ही नहीं वह नेशनल रेसलिंग में गोल्ड मेडल जीत मप्र की पहली पहलवान बनीं।

भाइयों ने दरवाजे लॉक किए, तो दीवार फांदकर गई दौडऩे
रानी ने बताया कि हमारा गांव जखारा है। पापा खेती करते थे। गांव में दंगल होता, तो पापा जाने से मना कर देते। लेकिन मैं चोरी-चोरी देख आती। मेरा मन भी कुश्ती लडऩे का हुआ। बुआ ने आप बीती बताई और मुझे डरा दिया। मैंने अपने सपनों को दबा लिया। हम चार भाई बहन का खर्च खेती से पूरा नहीं हो पाता था। तब पापा ग्वालियर आ गए। यहां मेरा भी एडमिशन स्कूल में करा दिया। वहां मैंने लड़कों को दौड़ते देखा। मैंने भी दौडऩा शुरू किया। भाइयों ने देखा तो घर में लॉक कर दिया। फिरभी मैं चाहरदीवारी लांघकर दौडऩे जाती और लौटकर डांट खाती। क्योंकि मैं कुश्ती का बेसिक दौडऩा समझती थी।

पहले गांव खेला फिर सीढिय़ां चढ़ नेशनल जीती
शहर आने के बाद मेरी कुश्ती खेलने की इच्छा देख मां राजी हुईं और उन्होंने पापा और भाइयों को मनाया। किसी तरह वह सहमत हुए। पहले मैंने गांव में खेला। इसके बाद संभाग, स्टेट और फिर नेशनल खेला। हर जगह मेरी पोजीशन आई। इसके बाद मुझे भोपाल एकेडमी प्रैक्टिस के लिए भेजा गया। वहां मैं स्टेट में तो मेडल लाती, लेकिन जैसे ही नेशनल खेलती हार जाती। तब मैंने दंगल खेलकर पैसे इक_े किए और इंदौर एकेडमी में एडमिशन लिया। इसमें भी परिवार का काफी विरोध सहना पड़ा।

2020 में जीते ब्रांज, सिल्वर और गोल्ड मेडल
इंदौर एकेडमी में मैंने वे टेक्निक्स सीखीं, जो भोपाल में नहीं सीख पाई थी। कोच अजय वैष्णव के सानिध्य में 2016 में जूनियर में ब्रांज मेडल, 2017 सीनियर में ब्रांज, 2018 और 2019 में भी ब्रांज मेडल जीता। 2020 में मैंने ब्रांज, सिल्वर और गोल्ड मेडल अपने नाम किए।

नी इंजरी देख डॉक्टर ने कुश्ती से रोका, मैं लाई गोल्ड मेडल
2019 में मेरे लेफ्ट नी में इंजरी हो गई। मेरा पीसीएल चला गया। डॉक्टर ने कहा कि कुश्ती मत लडऩा। परिवार ने भी मना कर दिया। लेकिन मुझे फाइट लडऩी थी। उस समय मैं मथुरा में दाऊजी दंगल खेलने गई और एक लाख का चेक अपने नाम किया। इसके अलावा नेशनल खेलकर ब्रांज और सिल्वर मेडल अपने नाम किए। मैंने पिछले वर्ष सर्जरी कराई और अब मैं फिट हूं। इस समय मैं कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी कर रही हूं।

Mahesh Gupta
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