हिंदी से प्रेम ऐसा कि सात समंदर पार भी कर रहे प्रचार

हिंदी दिवस आज: हिंदी बने रोजगार की भाषा

By: Mahesh Gupta

Published: 14 Sep 2021, 05:15 PM IST

ग्वालियर.

हमारी मातृभाषा हिंदी है, लेकिन यह अभी तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए एक ओर जहां शहर के साहित्यकार प्रयासरत हैं, वहीं सात समंदर पार रह रहे एनआरआई भी हिंदी का प्रचार कर रहे हैं। वह वहां वर्कशॉप, प्रतियोगिता, सम्मेलन के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा दे रहे हैं तो कई किताबें भी लिख चुके हैं। उनका कहना है कि हिंदी यदि रोजगार की भाषा बनती है तो युवा पीढ़ी में भी हिंदी के प्रति प्रेम पनपेगा।

जापान में छपी मेरी पहली हिंदी की पत्रिका
मैं 31 साल से जापान में हूं। यहां मैंने कल्चरल सेंटर की स्थापना की। साथ ही हिंदी की पत्रिका ‘हिंदी की गूंज’ लिखी, जो जापान की पहली हिंदी पत्रिका है। मैंने खुद का अपना पब्लिशिंग भी खोला है। मैं जापान के विश्वविद्यालयों में वक्ता के रूप में हिंदी की खूबियां बताती हूं। मैं पिछले कई साल से हिंदी का फ्री ट्यूशन दे रही हूं। यहां कई ऐसे लोग हैं, जो भारत जाने से पहले हिंदी के बारे में जानना और समझना चाहते हैं। उन्हें भारत की संस्कृति से परिचित कराती हूं।
रमा शर्मा, राइटर, जापान

हिंदी को मान्यता देने बेल्जियम पार्लियामेंट में लगाई फाइल
विदेश में आकर लोग आर्थिक रूप से सक्षम हो जाते हैं, लेकिन संस्कृति और संस्कार में पिछड़ जाते हैं। युवा पीढ़ी विदेश इसलिए जा रही है क्योंकि रोजगार की भाषा इंग्लिश है। यदि हिंदी रोजगार की भाषा बन जाए तो अपने आप लोग हिंदी को पसंद करेंगे। मैं बेल्जियम में सारे त्योहार मनाता हूं। अभी तक हिंदी में छह किताबें लिख चुका हूं। मैंने बेल्जियम पार्लियामेंट में हिंदी को मान्यता देने के लिए फाइल लगाई है, जिससे अन्य भाषाओं की तरह हिंदी को भी सिलेबस में शामिल किया जाए।
कपिल कुमार, राइटर, बेल्जियम

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