मीसाबंदियों की पेंशन बंद योजना: जांच के लिए खुलेगी इन 100 मीसाबंदियों की फायलें, होगी जांच फिर होगा फैसला

मीसाबंदियों की पेंशन बंद योजना: जांच के लिए खुलेगी इन 100 मीसाबंदियों की फायलें, होगी जांच फिर होगा फैसला

By: Gaurav Sen

Published: 19 Jan 2019, 12:14 PM IST

ग्वालियर. इमरजेंसी के दौरान जेल में रहे लोगों को लोकतंत्र सैनानी का दर्जा देकर सरकार द्वारा दी जाने वाली सम्मान निधि और अन्य सुविधाएं लेने के लिए कई लोग नकली मीसाबंदी बन गए। जिले में पेंशन ले रहे 146 मीसाबंदियों का रेकॉर्ड संदेह के घेरे में है, सिर्फ 63 लोकतंत्र सैनानियों को ही सही पाया गया था। इसके लिए आए 100 से अधिक संदिग्ध आवेदनों की जांच अब तक पूरी नहीं हो सकी है। नकली मीसाबंदी बनने की कोशिश करने वालों का मामला 2017 में सामने आने के बाद शुरू हुई जांच में परतें खुलना शुरू होते ही राजनीतिक दबाव में जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब सरकार ने मीसाबंदियों के सत्यापन का आदेश निकाला है, जिसके बाद जांच के दौरान संदिग्ध पाए गए मीसाबंदियों की फाइल फिर से खुलने के आसार हैं।

क्या है मीसांबंदी सम्माननिधि
आपातकाल के दौरान 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक जेल में बंद रहे भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को जून 2008 में प्रदेश सरकार ने सम्मान निधि देने की शुरुआत की थी। सूत्र बताते हैं कि आवेदन की समय सीमा 30 जून 2013 के खत्म होने के बाद 100 से अधिक आवेदन कलक्टर कार्यालय में जमा किए गए थे। इन की जांच तत्कालीन एडीएम शिवराज वर्मा ने शुरू कर दी थी, लेकिन यह जांच अब डिब्बे में बंद है।


8 हजार देने के निर्णय से बढ़ा लालच

  • तत्कालीन प्रदेश सरकार ने आपातकाल के दौरान एक दिन जेल में निरुद्ध रहने वालों को भी 8 हजार रुपए सम्मान निधि के रूप में देने का निर्णय लिया था।
  • इसका सत्यापन पुराने मीसाबंदियों से कराने को भी मान्यता दी गई थी। एक दिन बंद रहने पर भी 8 हजार रुपए मिलने के लालच ने आवेदनों की संख्या बढ़ी दी थी। लगातार बढ़ रहे आवेदनों को संदेह के दायरे में लेकर जांच शुरू की गई तो 100 से ज्यादा आवेदन संदिग्ध निकले थे।
  • दस्तावेजों की प्रशासनिक जांच में सिर्फ 63 लोकतंत्र सैनानियों का रेकॉर्ड सही मिला था, बाकी के 146 जांच के दायरे में आ गए थे।
  • बाद में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए तत्कालीन सरकार ने दो मीसाबंदियों द्वारा प्रमाणित किए जाने के आदेश को निरस्त कर वास्तविक रेकॉर्ड धारकों को ही सम्माननिधि देने का निर्णय लिया था।

अपर कलक्टर ने पकड़े थे नकली मीसाबंदी
>> तत्कालीन एडीएम शिवराज वर्मा ने मीसाबंदी सम्माननिधि के लिए आए आवेदनों की जांच के दौरान फर्जी दस्तावेजों के सहारे निधि लेने की कोशिश करने वालों के दस्तावेज जब्त कर लिए थे।
>> इनमें उपनगर ग्वालियर निवासी नंदराम कुशवाह के राशन कार्ड में 57 साल उम्र दर्ज थी और वोटर कार्ड में जन्मतिथि 1970 लिखी थी।
>> बहोड़ापुर निवासी रामहेत जाटव ने शपथ पत्र में 63 वर्ष उम्र दर्शाई थी, जबकि 2015 में बने राशनकार्ड में उम्र 45 साल थी।
>> मोतीझील पहाड़ी के कृष्णानगर निवासी राजधर जाटव ने शपथ पत्र में 60 साल उम्र बताई थी, जबकि अधिकारियों ने पूछताछ की तो उसने 45 साल का होना स्वीकार किया।

इन पर जताया गया था संदेह
मीसा बंदी पेंशन के लिए आवेदन की तिथि तत्कालीन 30 जून 2013 रखी गई थी। इसके बाद भी आवेदन स्वीकार किए जाते रहे थे। 2015-16 में एडीएम द्वारा संदिग्ध दस्तावेज पकड़े जाने पर दस्तावेज लेखकों की भूमिका संदिग्ध मानी गई थी।
जो तीन आवेदक पकड़े गए थे, उनमें नंदराम और रामहेत को मीसाबंदी पैंशन ले रहे रघुनाथ शर्मा और प्रवेश सिंह सिकरवार ने अपने साथ जेल में बंद होना बताया था। हालांकि बाद में दोनों मीसाबंदियों ने सत्यापन किए जाने से इनकार कर दिया था।

यह है नियम
मीसाबंदियों को लेकर अधनियम बनाया गया है, इसमें राज्य सरकार सीधे सुनवाई नहीं करती, बल्कि जिला स्तर पर कलक्टर, जेल अधीक्षक, एसपी और प्रभारी मंत्री की समिति सुनवाई करती है। इनके द्वारा मीसाबंदी के रूप में सत्यापित किया जाना माना जाता है।
मध्यप्रदेश लोकतंत्र सैनानी सम्मान अधिनियम 2018 में इस समिति का प्रावधान है। अधिनियम के सेक्शन 9 में व्यवस्था है कि अपात्र पाए गए सैनानी को समिति सुनेगी और सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया जाएगा। अपात्रता सिद्ध होने पर सम्माननिधि की वसूली राजस्व संहिता के अनुसार की जा सकेगी।

इनका कहना है
राज्य सरकार को न स्वीकृत करने का अधिकार है, न कैंसिल करने का, यह अधिकार कलक्टर की अध्यक्षता में गठित समिति को है। यह समिति भी बिना सुनवाई के किसी की सम्माननिधि नहीं रोक सकती है।
मदन बाथम, राष्ट्रीय संयुक्त सचिव-लोकतंत्र सैनानी संघ

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