शिवपुरी से है प्रदेश का पहला जूडो जूनियर खिलाड़ी जिसे मिला है एकलव्य

किसी भी खेल के खिलाड़ी का सपना होता है कि वह अपने खेल की दम पर एकलव्य व विक्रम अवार्ड जरूर हासिल करे, लेकिन हर खिलाड़ी का यह सपना पूरा नहीं हो पाता है

By: Gaurav Sen

Published: 03 Nov 2017, 03:44 PM IST

शिवपुरी। किसी भी खेल के खिलाड़ी का सपना होता है कि वह अपने खेल की दम पर एकलव्य व विक्रम अवार्ड जरूर हासिल करे, लेकिन हर खिलाड़ी का यह सपना पूरा नहीं हो पाता है। शिवपुरी का पलाश समाधिया जिले का पहला ऐसा खिलाड़ी है जिसने 'एकलव्य' अवार्ड हासिल कर शिवपुरी का नाम रोशन किया है। इस साल वह कराते के जूनियर वर्ग में एकमात्र ऐसा खिलाड़ी है जिसे यह अवार्ड प्राप्त हुआ है।


पलाश को कराते का क, ख, ग सिखाने वाले कोच समीर खान का कहना है कि पलाश को यहां तक पहुंचाने में उसकी कड़ी मेहनत, टेक्निक के साथ-साथ उसकी मां की कड़ी मेहनत भी है। समीर खान के अनुसार पलाश में शुरूआत से एक आदत रही है, उसे जो भी काम दिया जाता है वह उसे जब तक पूरा नहीं कर लेता तब तक लगातार प्रयास करता रहता है। उसकी मां ने उसे कराते सिखाने के लिए न सर्दी देखी न बरसात, वह उसे हर रोज हर मौसम में प्रेक्टिस कराने के लिए पांच साल तक उनके यहां लाईं। वे बताते हैं जब पलाश का चयन खेल एवं युवा कल्याण विभाग की अकादमी में हो गया तो उसमी मां ने स्टेडियम के सामने किराए से कमरा लिया और वहां अपने बेटे के साथ रह कर उसे प्रेक्टिस करवाई। यही कारण है कि पलाश आज इस मुकाम तक पहुंचा है।


समीर खान कहते हैं कि इसके अलावा उसकी टेक्निक भी उसे बेहतर बनाती है। बकौल समीर खान यह शिवपुरी का पहला ऐसा खिलाड़ी है जिसने एकलव्य अवार्ड हासिल किया है, इससे पहले शिवपुरी के किसी भी खेल के किसी भी खिलाड़ी ने यह मुकाम हासिल नहीं किया। उनके अनुसार पलाश कराते का एकमात्र ऐसा जूनियर खिलाड़ी है, जिसे एकलव्य अवार्ड मिला है। समीर का कहना है कि यह मुकाम हासिल करने के लिए न सिर्फ बुखार होने के बाबजूद घंटों प्रेक्टिस की है बल्कि उसकी मां आशा समाधिया की भी कड़ी मेहनत है। समीर खान कहते हैं कि वह पिछले तीस साल से शिवपुरी में कराते सिखा रहे हैं, परंतु उनका सपना ७ नवम्बर को उस समय पूरा होगा जब पलाश को यह अवार्ड मिलेगा।


दिन-रात की मेहनत का मिला परिणाम
पलाश की मां आशा समाधिया का कहना है कि यहां तक पहुंचने के लिए पलाश ने दिन रात मेहनत की है। उनके अनुसार पलाश ने जब प्रेक्टिस शुरू की तो नौ साल की उम्र में उसे सुबह पांच बजे ग्राउंड जाना होता था, इस कारण मैं उसे ग्राउंड लेकर जाती थी। शाम को भी देर रात तक यही सिस्टम जारी रहता था। बकौल आशा समाधिया इस कड़े परिश्रम में पलाश के पिता नीरतकांत ने मुझे सपोर्ट कर संकल्प दिलवाया कि मैं पलाश को बड़ा खिलाड़ी बनाऊंगी और पलाश को इसके लिए मोटीवेट किया और मुझे पलाश के साथ भोपाल भेज दिया। भोपाल में सुबह चार बजे से प्रेक्टिस उसे पलाश को प्रेक्टिस पर ले जाती और रात तक प्रेक्टिस चलती। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों से खाना बना कर खाया घर की देख रेख की। यही कारण है कि मेरा पलाश यहां तक पहुंचा है।

Gaurav Sen
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