सामाजिक परिवर्तन का इतिहास लिखता है जनसम्पर्क, उससे क्रांति आती है और बदलाव भी संभव

आइटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में 'जनसम्पर्क: नए आयाम, संभावनाएं व चुनौतियांÓ पर हुई परिचर्चा

By: Mahesh Gupta

Published: 03 Jul 2021, 09:33 AM IST

ग्वालियर.

वर्ष 1990 में जब ग्लोबलाइजेशन का दौर था, तब देशों ने स्वीकार किया कि आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाना जरूरी है। मार्केट बड़ी कंपनियों के लिए खोल दिए गए। बहुत तेजी से बदलाव देखने को मिला, आधुनिक जनसम्पर्क के स्वरूप की शुरुआत वहीं से हुई। नए-नए आयाम जनसम्पर्क में जुड़ते दिखे। 150 देशों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के लोग पहुचते थे। अलग व्यवहार, विश्वास व तरीके होते थें, उस समय सामंजस्य बनाकर काम करना जनसम्पर्क की जरूरत थी। धीरे- धीरे स्वरूप बढ़ा और जनसम्पर्क एजेंसीज बढऩे लगी। जनसम्पर्क भी कंपनी के रूप में उभरने लगा था। जनसम्पर्क में साइंटिफिक आयाम भी जुड़े, जिनमें बिजनेस प्रोसेस, मार्केटिंग प्रोसेस महत्वपूर्ण आयाम है। अब जनसम्पर्क में रीइंजीनियरिंग, क्वालिटी कंटोल, सिग्मा एप्रोच की बात महत्वता से की जाने लगी है। खासकर क्राइसिस मैनेजमेंट एक अहम चुनौती है, क्राइसिस को भांपना, अगर न रोक सके तो उसका प्रभाव कम कर सकना महत्वपूर्ण है। क्राइसिस मैनेजमेंट के साथ डेमेज कंट्रोल, रेपुटेशन मैनेजमेंट के लिए भी जनसम्पर्क काम करें। नॉलेज अपडेशन, इंडस्ट्री अपडेशन, सोसायटी एन्वॉयर्नमेंट चेंज, कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट बेहद आवश्यक है। जनसम्पर्क के दौर पर चर्चा करते हुए वर्तमान की आवश्यकता के कारण नए परिवर्तित आयामों पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे मीडिया विशेषज्ञ एवं लेखक प्रो पुष्पेंद्र पाल सिंह। 'जनसम्पर्क: नए आयाम, संभावनाएं व चुनौतियांÓ पर परिचर्चा आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में आयोजित की गई, जिसे यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग व पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

इसके अंतर्गत देश के प्रमुख जनसम्पर्क क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लिया। जिनमें अपर सचिव जनसम्पर्क, मप्र शासन डॉ एचएल चौधरी, अवकाश प्राप्त संयुक्त संचालक, जनसम्पर्क मप्र शासन- सुभाष अरोऱा, मीडिया विशेषज्ञ एवं लेखक प्रो पुष्पेंद्र पाल सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसम्पर्क विभाग के अध्यक्ष प्रो पवित्र श्रीवास्तव उपस्थित रहे। इस परिचर्चा की अध्यक्षता आइटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के वाइस चांसलर डॉ एसएस भाकर ने की। परिचर्चा की शुरूआत में कोषाध्यक्ष एवं एनसी मेम्बर पीआरएसआई, भोपाल मनोज द्विवेदी ने स्वागत उद्बोधन व पीआरएसआई, भोपाल के सचिव डॉ संजीव गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संचालन का दायित्व आइटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष जयंत सिंह तोमर ने निभाया। इस परिचर्चा में जनसम्पर्क की भूमिका और समस्याओं पर वृहद चर्चा की गई। जनसम्पर्ककर्मी किस तरह बेहतर वातावरण माहौल बना सकते हैं और व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन में मदद करते हैं आदि बिंदुओं पर भी विचार विमर्श किया गया।

नैतिक दिशा में जनहित के लिए किए जाएं कार्य: सुभाष अरोरा
पूंजीवाद का विस्तार सब लपेटे जा रहा है। प्राथमिकताओं व प्रजातंत्र का स्वरूप भी बदल रहा है। अच्छे जनसम्पर्क कर्मी को सावधान रहना होगा, ताकि वे समाज के प्रति ईमानदार रहे। हम इस देश के जनसाधारण के प्रति जवाबदेह व निष्ठावान है। इसलिए हमेशा जनहित के लिए कार्य करे। जनसम्पर्क ऐसा माध्यम है जो सामाजिक परिवर्तन का इतिहास लिखता है। उससे क्रांति आती है, बदलाव आते हैं। स्वामी दयानंद, आदि शंकराचार्य का स्मरण करे तो कामयाबी का मूलमंत्र जनसम्पर्क है। सिर्फ इससे स्वयं को स्थापित करते हैं, विचारधारा स्थापित करते हैं लोगों को नया सोचने को प्रेरित करते हैं। युगो मे बांटा जाएं तो नारद जनसम्पर्क की परंपरा थी। वे बड़े देवता और असुरो से मिलते व संवाद कायम करते थे। जनसम्पर्क में रियासती जनसम्पर्क और सियासती जनसम्पर्क दोनों में बहुत अंतर है। जनसम्पर्क से बदलाव व क्रांति आई है, उसे आगे ले जाना चाहिए। उसे मुनाफियत में नहीं बदलना चाहिए। जनसम्पर्ककर्मी की भूमिका जनसम्पर्क को नैतिक दिशा में आगे बढ़ाने में होनी चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर में भ्रम निवारण भी चुनौती: डॉ चौधरी
सिर्फ शासकीय, निजी क्षेत्र की नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष भी अब अपनी छवि निर्माण और प्रभावित करने के लिए जनसम्पर्क पर निर्भर हो रहे हैं। कम्युनिकेशन के सभी माध्यमों का उपयोग करके जनसम्पर्क किया जा रहा है। समय के अनुसार जनसम्पर्क कार्यप्रणाली में बदलाव लाएं, तो इसमें सफल हो सकते हैं। अन्य पेशों की अपेक्षा ये एक पवित्र, सृजनात्मक और रचनात्मक कार्य है। इसमें लोककल्याण की भावना रहती है। हालांकि अब वाट्सएप ने चुनौतियां बढ़ाई है, कोई भी खबर वायरल हो जाती है। ऐसे में अलर्ट रहना जरूरी है ताकि सही जानकारी दी जा सके लोग भ्रमित हुए बिना लाभ ले सकें। सोशल मीडिया के दौर में भ्रम का निवारण करना चुनौती है, ज्यादा से ज्यादा तत्पर रहना पड़ता है।

पेंडेमिक सबसे बड़ी चुनौती, प्लानिंग का कंसेप्ट बदला: प्रो पवित्र
पहलेे सरकारी सेक्टर तक ही जनसम्पर्क सीमित था, लेकिन अब सेवा क्षेत्र, निजी क्षेत्र, सर्विस सेक्टर, चेरेटेबल ट्रस्ट में जनसम्पर्क के सेटअप बने हैं। स्पोट्र्सपर्सन, राजनेता, सेलीबेटीज भी जनसम्पर्ककर्मी रख रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जनसम्पर्क के दायरे को बढ़ा दिया है, जिसने इसका नया कांसेप्ट प्रस्तुत किया है। जनसम्पर्क पहले से ज्यादा एग्रेसिव, एप्रोच्ड और कस्टमर ओरियंटेड हो गया है। इसमें सफल होने पर भी एक चुनौती ये होगी कि जो डिजीटल फ्रेंडली नहीं है, उनसे हम कैसे सफल जनसम्पर्क कर सकें। मीडिया प्लानिंग भी अब कठिन होती जा रही है क्योंकि अब संस्थाएं अनपेड पब्लिसिटी पर फोकस करना चाहती हैं, जहां पैसा कम खर्च हो लेकिन प्रभाव पूरा हो। इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती है पेंडेमिक। जिसने जनसम्पर्क के कांसेप्ट व इम्लीमेंटेशन मैथड को बदल दिया है। पोस्ट पेंडेमिक के बाद अब सोचना जरूरी है कि स्ट्रेटजी कैसे बनाएं जिसे पहले से ज्यादा प्रभावी कर पाएं। इस पेंडेमिक ने लोगों को मोरली, साइक्लोजकली, सोशली व इकोनोमकली प्रभावित किया है, ऐसे में अपनत्व व सहानुभूति देने में भी सफल हो सकें।

बेहतर प्लानिंग के साथ हो जनसम्पर्क: प्रो एसएस भाकर
जनसम्पर्क सिर्फ इमेज मेकिंग के लिए नहीं बल्कि अवयेरनेस के लिए भी आवश्यक रूप से उपयोग किया जाता है। जैसे कोविड काल के दौरान शासकीय जनसम्पर्क विभागों ने किया। जनता में विश्वास जगाया कि वैक्सीेन आपके लिए कितना जरूरी है। जनसम्पर्क अपनी संस्था या व्यक्ति विशेष की उपस्थिति को महत्वता से दर्शाता है। खासकर एडवांस डिजीटल टेक्नोलॉजी ने इसे अत्यधिक प्रभावी व व्यापक स्वरूप दिया है। बेहतर प्लानिंग के आधार पर जनसम्पर्क से इमेज बनाना, विकसित करना ठीक है लेकिन ये भी पता हो कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, उसका क्या हितकारी प्रभाव है और प्लानिंग किस आधार पर बनाई जाना चाहिए।

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