scriptRani Laxmibai Birth Anniversary | Rani Laxmibai : ऐसा था रानी का वेडिंग कार्ड, बलिदान पर अंग्रेजों ने भी किया था सेल्यूट | Patrika News

Rani Laxmibai : ऐसा था रानी का वेडिंग कार्ड, बलिदान पर अंग्रेजों ने भी किया था सेल्यूट

jhansi ki rani: रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम के लिए हर साल समाधि पर लगता है मेला...।

ग्वालियर

Published: November 19, 2021 09:51:35 am

ग्वालियर। काशी के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में 19 नवंबर 1828 को लक्ष्मी ने जन्म लिया था। उनका नाम मणिकर्निका (manikarnika) रखा गया था। सभी लोग प्यार से मनु कहने लगे थे। जब वे 14 साल की थी तभी झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से मई 1842 में उनका विवाह हुआ। शादी की तैयारियां हुई। शादी के लिए आमंत्रण-पत्र भी तैयार किया गया था। उस विवाह पत्रिका में शादी का शुभ-मुहूर्त भी लिखा गया था। यह आज भी सुरक्षित है। लक्ष्मीबाई के शस्त्र आज भी सरकार के पास रखे हुए हैं।

jhansi3.jpg


patrika.com पर प्रस्तुत है रानी लक्ष्मीबाई की जयंती के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ यादें...।

jhansi1.jpg

प्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की वो कविता आज भी कई लोगों के कानों में गूंजती है। 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।' रानी लक्ष्मी बाई के पराक्रम पर लिखी यह कविता स्कूलों में भी पढ़ाई जाती है। 18 जून को लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। रानी (jhansi ki rani) को वीरता, शौर्य और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने के लिए हमेशा जाना जाता है। सरकार के पास कुछ दस्तावेज हैं, जो उनके बारे में जिज्ञासा पैदा करते हैं। उनमें से एक है लक्ष्मी बाई का शादी का कार्ड, जो अपने आप में बेहद दुर्लभ है।

विवाह के बाद बदला नाम

मणिकर्णिका का विवाह झांसी के महाराज गंगाधऱ राव नेवलकर से 1842 में हुआ, तब उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में उनका एक पुत्र हुआ, जो पैदा होने के चार माह बाद ही खत्म हो गया। महाराज गंगाधर ने अपनी मृत्यु से एक दिन पहले अपने चचेरे भाई के लड़के आनंद राव को गोद ले लिया था, जिसका नाम दामोदर राव रखा था।

balidaan.jpg

छबीली बुलाते थे पेशवा

लक्ष्मी के पिता बिट्ठूर के पेशवा ऑफिस में काम करते थे और लक्ष्मी अपने पिता के साथ पेशवा के यहां जाती थी। पेशवा भी लक्ष्मी को अपनी बेटी जैसा ही मानते थे। बहुत सुंदर दिखने वाली यह लड़की बहुत ही चंचल थी। पेशवा उसे छबीली कहकर पुकारने लगे थे।

बेटे की तरह दिलाई शिक्षा

मोरोपंत तांबे बिठूर के मराठा बाजीराव पेशवा के दरबार में नौकरी करते थे। मणिकर्णिका को वह सारी शिक्षाएं मिलीं जो उस दौर में महिलाओं को नहीं दी जाती थी। उन्हें एक बेटे के तरह यह सारी शिक्षा दी गई थी। उन्होंने घुड़सवारी, तलावारबाजी जैसे हुनर सीखे। यहां तक कि घर पर ही पढ़ना-लिखना सीखा। निशानेबाजी और मलखम्भ भी सीखा था।

bali.jpg

 

18 साल में बन गई थी शासक

लक्ष्मीबाई 18 साल की कम उम्र में ही झांसी की शासिका बन गई थी। उनके हाथों में झांसी का साम्राज्य आ गया था। ब्रिटिश आर्मी के एक कैप्टन ह्यूरोज ने लक्ष्मी के साहस को देख उन्हें सुंदर और चतुर महिला कहा था। यह वही कैप्टन था, जिसकी तलवार से लक्ष्मी ने प्राण त्यागे थे। इतिहास के पन्नों में यह भी मिलता है कि ह्यूरोज ने इसके बाद रानी को 'सेल्यूट' भी किया था।


तब पिता ने किया लालन-पालन

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 में वराणसी के मराठी कराड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनका पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागिरथी सप्रे थे. लक्ष्मीबाई का मायके में नाम मणिकर्णिका तांबे थे और उन्हें प्यार से मनु कह कर पुकारा जाता था। चार साल की उम्र में मनु की माता का देहांत हो गया था। इसके बाद उनका लालन-पालन पिता ने किया।

मैं झांसी नहीं दूंगी

पति गंगाधर की मौत हो चुकी थी। लक्ष्मी बाई राजकाज संभालने लगी थीं। उसी दौर में गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी की नीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने लक्ष्मीबाई के गोद लिए बालक को वारिस मानने से इनकार कर दिया। रानी ने अंग्रेजों की यह दलील मानने से इनकार कर दिया। उन्हें दो टूक कह दिया कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इसी बात से अंग्रेजों और रानी लक्ष्मीबाई के बीच युद्ध का ऐलान हो गया था। रानी ने भी तलवार उठा ली थी।


झांसी में हुआ था पहला युद्ध

अंग्रेजों ने झांसी पर 23 मार्च 1858 को हमला कर दिया और 3 अप्रैल तक लगातार युद्ध लड़ते रहे। जिसमें तात्या टोपे ने रानी का साथ दिया, जिसकी वजह से अंग्रेज झांसी में 13 दिन तक नहीं घुस पाए थे। अंततः 4 अप्रैल को अंग्रेज झांसी में घुस गए और रानी को झांसी छोड़ना पड़ गया। रानी एक ही दिन में कालपी पहुंच गई, जहां उन्हें नाना साहेब पेशवा, राव साहब और तात्या टोपे का साथ मिल गया। इसके बाद वे सभी ग्वालियर पहुंचे, जहां दोनों पक्षों में 17 जूनको निर्णायक युद्ध हुआ।

कैसे हुई थी रानी की मृत्यु

युद्ध में रानी की मृत्यु के अलग-अलग मत भी मिलते हैं। लॉर्ड केनिंगकी रिपोर्ट सर्वाधिक विश्वसनीय मानी जाती है। ह्यूरोज की घेराबंदी और संस्साधनों की कमी के चलते रानी लक्ष्मीबाई घिर गई थीं। ह्यूरोज ने पत्र लिखकर रानी से एक बार फिर समर्पण करने को कहा था, लेकिन रानी अपने किले से निकलकर मैदान में उतर आई थीं। उनका इरादा दो तरफ से घेरने का था, लेकिन तात्या टोपे ने आने में देरी कर दी और रानी अकेली पड़ गई थी।

कैनिंग की रिपोर्ट के मुताबिक रानी को लड़ते हुए गोली लगी थी, जिसके बाद विश्वस्त सिपाहियों के साथ ग्वालियर शहर में मौजूद रामबाग तिराहे से नौगजा रोड पर आगे बढ़ते हुए स्वर्ण रेखा नदी की ओर आगे बढ़ीं। नदी के किनारे रानी का नया घोड़ा अड़ गया, रानी ने दूसरी बार नदी पार करने का प्रयास किया, लेकिन वह घोड़ा वहीं अड़ गया, वो आगे बढ़ने को तैयार नहीं था, अंतत गोली लगने से खून पहले ही बह रहा था और रानी वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ी थीं।

यह भी उल्लेख मिलता है कि एक तलवार ने उसके सिर को एक आंख समेत अलग कर दिया और रानी शहीद हो गई थी। यह भी बताया जाता है कि शरीर छोड़ने से पहले उन्होंने अपने साथियों से कहा था कि उनका शरीर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए। इसके बाद बाबा गंगादास की शाला के साधु झांसी की पठान सेना की मदद से शाला में ले आए थे। वहां तत्काल उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। रानी की वीरता देख ह्यूरोज ने भी लक्ष्मीबाई की तारीफ की थी और उन्हें सेल्यूट किया था। बलिदान का यह दिन इतिहास के पन्नों में 17-18 जून का मिलता है। फिर भी इस बलिदान के आगे तारीखें कभी बढ़ी नहीं रही।

मुख्यमंत्री चौहान ने किया नमन

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जयंती पर उन्हें नमन किया। चौहान ने अपने ट्वीट संदेश ेमं कहा कि

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी! अद्वितीय शौर्य और पराक्रम का पर्याय, महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती पर कोटिश: नमन्! आपने भारतीय इतिहास में वीरता और आत्मसम्मान का ऐसा अप्रतिम अध्याय जोड़ा है, जो देश को युगों-युगों तक गौरवान्वित करता रहेगा।

गृहमंत्री नरोत्तम मिश्र ने अपने ट्वीट संदेश में कहा कि 1857 की क्रांति की महानायिका, भारतीय महिलाओं के शौर्य और पराक्रम की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती पर सादर नमन। देश की आजादी के लिए उनका त्याग और बलिदान प्रत्येक भारतीय को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता है।

सबसे लोकप्रिय

शानदार खबरें

Newsletters

epatrikaGet the daily edition

Follow Us

epatrikaepatrikaepatrikaepatrikaepatrika

Download Partika Apps

epatrikaepatrika

Trending Stories

इन नाम वाली लड़कियां चमका सकती हैं ससुराल वालों की किस्मत, होती हैं भाग्यशालीजब हनीमून पर ताहिरा का ब्रेस्ट मिल्क पी गए थे आयुष्मान खुराना, बताया था पौष्टिकIndian Railways : अब ट्रेन में यात्रा करना मुश्किल, रेलवे ने जारी की नयी गाइडलाइन, ज़रूर पढ़ें ये नियमधन-संपत्ति के मामले में बेहद लकी माने जाते हैं इन बर्थ डेट वाले लोग, देखें क्या आप भी हैं इनमें शामिलइन 4 राशि की लड़कियों के सबसे ज्यादा दीवाने माने जाते हैं लड़के, पति के दिल पर करती हैं राजशेखावाटी सहित राजस्थान के 12 जिलों में होगी बरसातदिल्ली-एनसीआर में बनेंगे छह नए मेट्रो कॉरिडोर, जानिए पूरी प्लानिंगयदि ये रत्न कर जाए सूट तो 30 दिनों के अंदर दिखा देता है अपना कमाल, इन राशियों के लिए सबसे शुभ

बड़ी खबरें

Corona Update: कोरोना ने बनाया नया रिकॉर्ड, 24 घंटे में 3 लाख 47 हजार नए केस, 2.51 लाख रिकवरCoronavirus: स्वास्थ्य मंत्रालय इन 6 राज्यों में कोविड स्थिति पर चिंतित, यहां तेजी से फैल रहा संक्रमणGhana: विनाशकारी विस्फोट में 17 लोगों की मौत, 59 घायलभारत ने जानवरों के लिए विकसित किया पहला कोरोना वैक्सीन,अब शेर और तेंदुए पर ट्रायल की योजना50 साल से जल रही ‘अमर जवान ज्योति’ आज से इंडिया गेट पर नहीं, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जलेगीबड़ी खबर- सरकार ने माफ किया पुराना बिल, अब महंगी होगी बिजलीCash Limit in Bank: बैंक में ज्यादा पैसा रखें या नहीं, जानिए क्या हो सकती है दिक्कतयूपी विधानसभा चुनाव 2022 के दूसरे चरण की 55 विधानसभा सीटों के लिए आज से होगा नामांकन
Copyright © 2021 Patrika Group. All Rights Reserved.