कोरोना 2.0 की तालाबंदी में बेसहारा भूखे, मददगार गायब

कोरोना की दूसरी लहर को काबू करने के लिए तालाबंदी बेघरों के लिए मुसीबत साबित हो रही है, क्योंकि कोरोना के पहले फेज में तो खानाबदोशो...

 

ग्वालियर. कोरोना की दूसरी लहर को काबू करने के लिए तालाबंदी बेघरों के लिए मुसीबत साबित हो रही है, क्योंकि कोरोना के पहले फेज में तो खानाबदोशों से लेकर जानवरों तक की सुध ली गई थी। लेकिन संक्रमण के दूसरे दौर में इनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। न तो सरकारी एजेंसियों ने इन लोगों का पेट भरने का इंतजाम किया है न इस बार समाज की सेवा करने की दंभ भरने वाले आगे आए हैं। संक्रमण की मार खामियाजा इन बेवसों को रुला रही है। शहर में ऐसे तमाम लोग हैं जो सड़क किनारे जिंदगी काट रहे हैं। उनकी गुजर बसर का जरिया भी सीमित है। इनमें से ज्यादातर बाजारों में फेरी लगाकर सामान बेचने, मजदूरी के भरोसे हैं। कुछ उम्रदराज दूसरों से मांग कर पेट भरने वाले हैं। कोरोना की दूसरी लहर को थामने के लिए कोरोना कफ्र्यू की वजह से तीन दिन से शहर बंद है। ऐसे में इन परिवारों के सामने रोटी बडा सवाल बन गई है। इन लोगों की टीस है कि वह खुद तो भूखे सो सकते हैं, लेकिन बच्चों को भूख सहन करना कैसे सिखाएं। इस बार पर उनकी मदद के लिए कोई कोई हाथ आगे नहीं आया है।
कोरोना की पहली लहर में लॉकडाउन के साथ सड़कों पर जिंदगी गुजारने वालों की सुध लेने के लिए सरकारी एजेंसियां और समाज की सेवा करने वाले आगे आए थे। लेकिन संक्रमण के दूसरे फेज में सब गायब हैं। कोरोना कफ्र्यू की वजह से सब बंद है तो यह बेवस भूख की मार झेल रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि उन्हें भी पता था कोरोना की वजह से बाजार, कामधाम सब बंद हो रहा है, लेकिन उनकी हैसियत इतनी नहीं थी कि सात दिन के लिए खाने का इंतजाम कर सकें, इसलिए भगवान भरोसे हैं। परिवार के बड़े लोग तो हालात को समझ रहे हैं, लेकिन बच्चे भूख सहन नहीं कर पाते। खाने के लिए मांगते हैं तो समझ में नहीं आता उन्हें क्या खिलाएं, क्योंकि बर्तन और जेब दोनों खाली है।

कुछ हमारे बारे में भी सोचो
फूलबाग पर गुब्बारे बेचकर गुजर बसर करने वाली सुनीता और उनका परिवार कहता है, लॉकडाउन लगा है। सब कुछ बंद है। खाने के लिए जो कुछ था वह लॉकडाउन के पहले दिन खत्म हो गया। अब खाली हाथ हैं। इसलिए भूखे सोते हैं और उसी हाल में उठकर किसी तरह दिन काटते हैं। यहां तक की पानी का इंतजाम भी मुश्किल हो रहा है। सुनीता का कहना है कि उनकी तरह फूलबाग पर कई परिवार हैं। कोई तो हमारे बारे में भी सोचो, बच्चे भूख से बिलखते हैं। उनका पेट भरने के लिए आसपास की कॉलोनी में आटा, दाल मांगने भी गए तो लोगों ने दरवाजे नहीं खोले। अब क्या करें। सरकारी विभाग या समाज सेवी कोई मदद के लिए नहीं आया है। समझ में नहीं आता अभी लॉकडाउन में चार दिन और बाकी हैं कैसे जिंदा रहेंगे। सुनीता की पड़ोसन की भी यही परेशानी थी, उनका कहना था बच्चे भूखे हैं। कैसे जिएं क्या खाएं कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कोरोना से तो बचे हैं लेकिन भूख से मर जाएंगे। एक गाड़ी वाला था 10 रुपए में बच्चों को चावल, दाल दे जाता था। लॉकडाउन में उसका आना भी बंद हो गया है। हमारा गांव भी दूर है। वहां जाने की स्थिति नहीं है। क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा है।

बेसहाराओं के यहां हैं डेरे
पड़ाव के नए आरओबी के नीचे, फूलबाग, गोला का मंदिर, कटोराताल के पास, एबी रोड, शिवपुरी लिंक रोड, अचलेश्वर, महाराज बाड़ा, खेड़ापति रोड सहित भिंड रोड सहित शहर में कई जगहों पर ऐसे परिवार सड़क किनारे गुजर बसर कर रहे हैं। उनका कहना है कि रोज जो कमाते हैं उससे ही खाते हैं। कोरोना से बचने के लिए काम बंद है तो बर्तन और पेट दोनों खाली हो चुके हैं।


पहले फेज में यह थे इंतजाम
कोरोना के पहले फेज में प्रशासन ने गरीबों के लिए खाने का इंतजाम किया था। इसके अलावा समाज सेवी भी आगे बढ़कर बेसहाराओं और जानवरों तक के लिए खाने का इंतजाम कर रहे थे।

रिज़वान खान Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned