हाईकोर्ट ने किया बच्चों की इच्छा का सम्मान, मां को सौंपा, माह में दो दिन पिता संग

उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने पति-पत्नी के बीच विवाद में बच्चों की कस्टडी को लेकर फैसला सुनाया है। इससे पहले अदालत ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर बच्चों की इच्छा जानी

ग्वालियर. उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने पति-पत्नी के बीच विवाद में बच्चों की कस्टडी को लेकर फैसला सुनाया है। इससे पहले अदालत ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर बच्चों की इच्छा जानी। इसके बाद 11 साल के बेटे और 9 साल की बेटी को उनकी मां के सुपुर्द करने का फैसला सुनाया। साथ ही महीने में दो दिन पिता को अपने बच्चों के साथ समय बिताने की मंजूरी दी गई है।
जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने इस मामले में फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता और उसके पति की शादीशुदा जिंदगी में अनबन शुरू हुई और विवाद बढऩे पर दोनों अलग-अलग रहने लगे। महिला ने याचिका दायर कर पति पर बच्चों को जबरन अपने पास रखने का आरोप लगाया था। इस पर अदालत ने कहा कि बच्चों से बात करने के बाद यह तो साफ हो गया कि पिता ने उनकी अच्छे से देखभाल की है, लेकिन अब वे अपनी मां के साथ रहना चाहते हैं, इसलिए बच्चों की इच्छा का सम्मान करते हुए उनको मां को सौंपा जाता है। महीने के दूसरे और चौथे रविवार को पिता उनके साथ समय बिता सकता है।


पत्नी इंदौर में रहती है और बच्चे ग्वालियर में पढ़ते हैं
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान बताया गया कि बच्चे वर्तमान में ग्वालियर केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ते हैं। उनकी मां इंदौर में रहती है। यदि बच्चों की कस्टडी उनको दी जाती है तो पढ़ाई प्रभावित होगी। इस पर याचिकाकर्ता की तरफ से कोविड-19 के कारण स्कूल बंद होने का हवाला दिया गया। दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा कि बच्चों को पिता ने हिरासत में रखा है ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है। मां को बच्चों की कस्टडी दी जा रही है, लेकिन बच्चों के कल्याण के लिए स्कूल खुलने पर याचिकाकर्ता को ग्वालियर में ही उनकी पढ़ाई की व्यवस्था करनी होगी। ऐसी स्थिति में स्कूल परिवर्तन बच्चों के हित में नहीं होगा।


हाईकोर्ट ने दिया था सुलह करने का मौका
याचिका पर सुनवाई से पहले पति-पत्नी को आपस में समझौता करने का मौका दिया गया। अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी के कार्यालय में दोनों को बैठाया गया, लेकिन दोनों साथ रहने को तैयार नहीं थे। आखिरकार बच्चों की बात सुनकर उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया।

रिज़वान खान Desk
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