इस बार मेड इन इंडिया राखी का बाजार होगा गुलजार

भारत-चीन विवाद : भाईयों की कलाई पर बंधेगी अपने देश की रेशमी डोर

By: prashant sharma

Published: 07 Jul 2020, 06:16 PM IST

ग्वालियर. भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व इस साल 3 अगस्त को पडऩे जा रहा है। रक्षाबंधन के पर्व पर इस बार भारतीय भाईयों की कलाई पर चाइनीज राखियां नहीं सजेंगी। भारत और चीन के बीच चल रहे विवाद के चलते ऐसे हालात बनते दिख रहे हैं। शहर में राखियों की बिक्री करने वाले व्यापारी भी इस साल चाइनीज राखियों की खरीदारी का ऑर्डर नहीं दे रहे हैं। इसके चलते अनुमान लगाया जा रहा है कि इस वर्ष मेड इन इंडिया राखियों के बाजार का बोलबाला रहेगा। कारोबारियों की मानें तो राखियों का शहर भर में एक करोड़ से अधिक तक व्यापार होता है। ये राखियां 5 रुपए से लेकर 200 रुपए तक में बिकती हैं।
इन जगहों से आती हैं राखियां
शहर में राखियों का कारोबार रक्षाबंधन से 15 दिन पूर्व ही शुरू हो जाता है। राखी विक्रेताओं के मुताबिक देश में राखियां सबसे अधिक कोलकाता, अलवर, राजकोट, दिल्ली और आगरा में तैयार की जाती हैं। इन शहरों से राखियों को देश भर में भेजा जाता है। इस वर्ष देसी राखियों का बाजार बढ़ सके इसके लिए इन शहरों में राखी बनाने वालों ने रेशम की राखियों को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया है।
रेशम का उपयोग नहीं
राखी के थोक कारोबारी मुकेश अग्रवाल ने बताया कि चीन से आने वाली अधिकांश राखियों में रेशम की डोरी नहीं बल्कि प्लास्टिक और चमड़े के बेल्ट का उपयोग होता है। दुकानदारों को इन्हें सुरक्षित रखने में भी परेशानी आती है। वहीं इनमें लगे खिलौने के टूटने और सेल खराब होने पर ये बिक्री के लायक नहीं रहती हैं।

एक दशक में बढ़ा चाइनीज राखियों का चलन
राखी के फुटकर कारोबारी लालाबाबू अग्रवाल ने बताया करीब एक दशक पूर्व चाइनीज राखियों का आना शुरू हुआ और इनका व्यापार 40 से 50 लाख रुपए तक पहुंच गया। यह राखियां ज्यादातर म्यूजिकल व लाइट वाली होती हैं, इनमें सेल लगे होते हैं। कुछ राखियों में खिलौने व कार्टून कैरेक्टर लगे होने से बच्चे इन्हें पसंद करते हैं। चीन ने यहां के बाजार को देखते हुए राखियां बनाना शुरू किया था, पर इस बार कोई भी कारोबारी चाइनीज राखियों को नहीं मंगा रहा है।

अगले साल के लिए
भी प्लानिंग की
आगरा के राखी कारोबारी विनोद ने बताया कि इस वर्ष चाइना की राखियों को पूरा-पूरा बहिष्कार होना है। हमारी सोच है कि मोली (कलावा), चंदन कलर, रेशम के धागे की राखी को बढ़ावा मिले। इसके लिए अगले साल की प्लानिंग भी कर ली है। इस वर्ष के लिए राखियों का उत्पादन कोरोना काल से पहले ही कर चुके थे। आगरा के राखी कारोबारी राहुल अग्रवाल ने बताया कि राखियों की बिक्री शुरू कर दी है और 15 जुलाई तक बाजारों में दिखने भी लगेगी। इस साल चाइना की राखी नहीं बिकेगी, देसी राखियों को इससे फायदा होगा। इनके दामों में भी खास अंतर देखने को नहीं मिलेगा।

prashant sharma Desk
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