थक गए मासूम, रोजी-रोटी भूले, माता-पिता अब बस गांव जाने का जुनून

हमें तो अब सिर्फ गांव लौटना है, चाहे कुछ भी हो। खेती करेंगे जो रुखी सूखी मिलेगी उसे बांट कर खाएंगे। परिवार के साथ घर लौटने के इस जुनून में सैकड़ों परिवारों का पलायन शुक्रवार को भी जारी था।

ग्वालियर. हमें तो अब सिर्फ गांव लौटना है, चाहे कुछ भी हो। खेती करेंगे जो रुखी सूखी मिलेगी उसे बांट कर खाएंगे। परिवार के साथ घर लौटने के इस जुनून में सैकड़ों परिवारों का पलायन शुक्रवार को भी जारी था। उनके नादान बच्चों के चटखते होठों से जाहिर था कि घर पहुंचने की जल्दी में माता-पिता कलेजे के टुकड़ों की भूख प्यास को भी अनदेखा कर रहे हैं।

अमायन भिंड निवासी अंगद सिंह कुशवाह बाइक पर पत्नी कविता दो नादान बेटियों और एक साल के बेटे के साथ नाके पर रुके। चेहरों पर थकान से साफ जाहिर था परिवार लंबा सफर तय कर आ रहा है। 7 साल की बेटी ममता तो नींद पर काबू नहीं कर पाई तो हैंडिल पर सिर टिका कर गहरी नींद में सो चुकी थी। खेती में परिवार की गुजर करना मुश्किल था इसलिए टोहन हरियाणा में पानी पूरी का काम शुरू किया था। 5 मार्च को परिवार को साथ ले गया। 17 दिन बाद लॉकडाउन हो गया तब से परिवार वहीं फंसा था। कुछ दिन तो गुजारा चल गया, अब भूखे मरने की नौबत आ चुकी थी। इसलिए बाइक पर परिवार को बैठा कर गांव लौट रहा है। अंगद का कहना था कि अब तो वापसी का कोई सवाल नहीं है। क्योंकि पता नहीं लॉकडाउन कब तक चले। बाजार खुला भी लोग पहले जैसी जिंदगी जिएंगे इसकी उम्मीद भी कम है।

इसी जमीन में करेंगे गुजर-बसर, मिलजुलकर रहेंगे
तांडा, पंजाब से बाइक से राधेश्याम कुशवाह पत्नी रिंकी और दो बच्चों के साथ तीन दिन का सफर तय कर ग्वालियर पहुंचे। राधेश्याम ने बताया कि गांव में जमीन कम है। दो भाइयों का परिवार भी है इसलिए तांडा पंजाब में चाट का काम शुरू किया था, लेकिन धंधा जम नहीं पाया था कि लॉकडाउन हो गया। मकान मालिक भला आदमी था तो उसने किराए की बात नहीं की, बल्कि 10 दिन परिवार को पेट भर खाना खिलाया। अब लॉकडाउन खुलता नहीं दिखा तो बाइक पर परिवार को बिठाकर गांव के लिए रवानगी डाली। सोच लिया है कि जो जमीन है उसमें ही भाइयों के साथ मिलकर खेती करेंगे।

6 हजार भाड़े के दिए, गांव अब भी दूर
जौरी, दतिया निवासी संजीव प्रजापति भी परिवार के साथ निरावली नाके के पास घर जाने के लिए वाहन के इंतजार में थे। संजीव ने बताया पालनपुर, गुजरात में चाट का काम शुरू किया था। शुरुआत में काम अच्छा चला तो भाईयों को भी साथ ले गए, लेकिन कोरोना ने उनका धंधा बर्बाद कर दिया। अब छह सदस्यों के परिवार के साथ घर लौट रहे हैं। अब तक छह हजार रुपए किराए में खर्च हो चुके हैं, लेकिन गांव अभी दूर है। आगरा से निरावली तक ट्रक चालक ने छोडऩे के एवज में 900 रुपए किराया वसूला।

जिंदगीभर नहीं भूलेंगे
संजीव ने बताया कि यह हालात जिंदगी भर नहीं भूलेंगे, गांव लौटने के लिए इतने जतन करना पड़े, इतने तो विदेश जाने के लिए नहीं करना पड़ते। अब कसम खाई है कि जब तक हालात ठीक नहीं होंगे गांव से बाहर कदम नहीं रखेंगे।

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रिज़वान खान Desk
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