शहर का जल स्तर स्थिर रखने वाली दो नदियां बदहाली का शिकार

लश्कर, मुरार और ग्वालियर तीनों उपनगरों के रहवासियों के लिए लगभग 100 सालों तक पानी का सहारा रहीं स्वर्ण रेखा और मुरार नदी अब अस्तित्व खो चुकी हैं।

ग्वालियर. लश्कर, मुरार और ग्वालियर तीनों उपनगरों के रहवासियों के लिए लगभग 100 सालों तक पानी का सहारा रहीं स्वर्ण रेखा और मुरार नदी अब अस्तित्व खो चुकी हैं। शहर की लाइफलाइन कही जाने वालीं इन नदियों को जमीन के लालच और अधिकारियों के धन कबाडऩे की नीति ने नाले मेंं बदल दिया है। स्थिति यह है कि 12 किलोमीटर तक शहर में बहने वाली मुरार नदी के बीच में ही लोगों ने सडक़ बनाकर बहाव को पाट दिया है, जबकि 13 किलोमीटर शहर में बहने वाली स्वर्णरेखा नगर निगम के अफसरों की शिकार होकर रह गई है।
नदी खो चुकी अस्तित्व

मुरार

- रमौआ बांध से निकलकर भिंड जिले की सीमा तक बहाव क्षेत्र वाली मुरार नदी में बीते 20 साल पहले तक पूरे साल पानी रहता था।
- 1940 के पुराने भू-अभिलेखों में मुरार नदी की चौड़ाई 5 मीटर से लेकर 15 मीटर तक उल्लेखित है।
- मुरार नदी का प्रोजेक्ट 332 करोड़ का था, उसे तत्कालीन निगम आयुक्त ने? बिना एमआईसी एवं नगर निगम परिषद के राज्य सरकार को भेज दिया था। यह डीपीआर व्यर्थ साबित हुई है।
- प्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद क्षेत्रीय विधायक मुन्नालाल गोयल ने 72 करोड़ रुपए का जनता -प्रोजेक्ट शहर विकास की बैठक में रखा था, लेकिन इस पर भी कोई निर्णय नहीं हुआ है।

स्वर्णरेखा

- हनुमान बांध से शर्मा फार्म तक 13 किमी के क्षेत्र में लश्कर और ग्वालियर क्षेत्र को बांटती है।
- नदी के किनारों को कटाव से बचाने के लिए लगभग 12 साल पहले सीमेंट कांक्रीट कराया गया था।
- नदी के तल के नीचे शहर की सीवर लाइन को निकाला गया। इसके बाद से इसमें गंदगी बढऩा शुरू हुई।
- 2009 के बाद से अभी तक स्वर्णरेखा को पुनजीॢवत करने के लिए हर साल पैसा खर्च किया जाता रहा है।
-बांध से लक्ष्मीबाई समाधि स्थल सीसी लाइनिंग होने के बाद शहर का भूजल स्तर भी लगातार गिरता गया।
-लक्ष्मीबाई समाधि स्थल से लेकर फूलबाग बारादरी तक पानी को रोकने के लिए गेट लगवाए गए थे, यह अब खराब हैं।
-स्मार्ट सिटी ने 120 करोड़ रुपए की योजना बनाई है, इनसे नदी के बीच में 5 ब्रिजों को बेहतर किया जाना है और सौंदर्यीकरण के काम कराने का दावा किया जा रहा है।
- नाव चलाने के लिए नगर निगम ने नदी पर 50 लाख रुपए खर्च किए थे, इसके साथ ही सौंदर्यीकरण के नाम पर फिश एक्वेरियम बनाया गया, यह अब निष्प्रयोज्य हैं।
- नदी का सीमांकन कराने के लिए आदेश के बाद नगर निगम ने 13 जनवरी 2014 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सुनवाई में 25 हेक्टेयर भूमि मुरार नदी के किनारे से विस्थापित होने वालों के पुनर्वास के लिए आरक्षित कर कॉलोनी बसाने की बात कही थी।
- ट्रिब्यूनल ने 29 जनवरी 2013 को अपने आदेश में इन कॉलोनियों को लेकर सूचनाएं प्रकाशित कराने का आदेश दिया, लेकिन यह अमल कभी भी नहीं हो पाया।

इन पर नहीं हुआ अमल

नदी का सीमांकन कराने के लिए आदेश के बाद नगर निगम ने 13 जनवरी 2014 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सुनवाई में 25 हेक्टेयर भूमि मुरार नदी के किनारे से विस्थापित होने वालों के पुनर्वास के लिए आरक्षित कर कॉलोनी बसाने की बात कही थी। वहीं ट्रिब्यूनल ने 29 जनवरी 2013 को अपने आदेश में इन कॉलोनियों को लेकर सूचनाएं प्रकाशित कराने का आदेश दिया, लेकिन यह अमल कभी भी नहीं हो पाया।

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राजेश श्रीवास्तव Desk
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