अब 'चीनी-पीओपी' नहीं, गजानन 'अपनी माटी' के

हनुमानगढ़. कोरोना संक्रमण की मार से ठप बाजार त्योहारी सीजन में अच्छी ग्राहकी की उम्मीद में सजने लगा है। शहर का पैसा शहर में खर्च होगा तो स्थानीय बाजार गुलजार होगा। गजानन की अराधना के साथ फेस्टिव सीजन का आगाज हो चुका है।

By: adrish khan

Updated: 11 Sep 2021, 09:45 PM IST

अब 'चीनी-पीओपी' नहीं, गजानन 'अपनी माटी' के
- शहर में इस बार स्थानीय स्तर पर कुंभकारों की बनाई कच्ची माटी की गणेश प्रतिमा की अच्छी मांग
- चायनीज गजानन की बजाय स्थानीय स्तर पर निर्मित गणेश प्रतिमा की बिक्री से कुंभकारों में खुशी
हनुमानगढ़. कोरोना संक्रमण की मार से ठप बाजार त्योहारी सीजन में अच्छी ग्राहकी की उम्मीद में सजने लगा है। शहर का पैसा शहर में खर्च होगा तो स्थानीय बाजार गुलजार होगा। गजानन की अराधना के साथ फेस्टिव सीजन का आगाज हो चुका है। अगर गणेश चतुर्थी के दृष्टिगत गणेश प्रतिमाओं की बिक्री पर नजर डाले तो इस बार चायनीज या फिर पीओपी की बजाय स्थानीय कुंभकारों के कच्ची माटी से बनाए गजानन अधिक बिक रहे हैं।
इससे दोहरा लाभ हो रहा है। एक तो कुंभकारों की अच्छी ग्राहकी हो रही है। दूसरा लाभ यह कि इससे किसी तरह का पर्यावरण को नुकसान भी नहीं है। इससे कुंभकारों में खुशी का माहौल है। साथ ही एक आशा भी बंध रही है कि आगे दीपोत्सव पर लोगबाग चायनीज लडिय़ों व दीयों की बजाए यहां बनाए गए माटी के दीपक खरीदेंगे। गणेश प्रतिमाओं की बिक्री से मिले उत्साह के साथ कुंभकार दीये बनाने में जुट चुके हैं।
बढ़ रहा रुझान
जंक्शन में अम्बेडकर चौक के पास दुकान चलाने वाले कुंभकार धनराज प्रजापत ने बताया कि पिछले कुछ बरसों में लोगों का कच्ची माटी की गणेश प्रतिमाओं के प्रति रुझान बढ़ा है। अब लोग प्लास्टिक-फायबर आदि से निर्मित चायनीज गणेश प्रतिमा या पीओपी से बनी प्रतिमा की बजाय माटी के गणेशजी खरीद रहे हैं। डेढ़ सौ रुपए से लेकर डेढ़ हजार रुपए तक की प्रतिमाएं बिक रही हैं। आकार व वजन के हिसाब से प्रतिमाओं के मूल्य तय होते हैं। गत तीन-चार साल से कच्ची माटी की गणेश प्रतिमाएं बना रहे हैं। साल दर साल इनकी बिक्री बढ़ रही है।
नहीं होगी बेअदबी
कुंभकार देवीलाल कारगवाल ने बताया कि फायबर, पीओपी आदि से निर्मित प्रतिमाओं का विसर्जन करने के बाद जब नदी-नहर में पानी कम होता है तो प्रतिमाएं वैसी की वैसी ही पड़ी दिखती हैं। तलछट व कीचड़ में प्रतिमाओं की बेअदबी होती है। मगर कच्ची माटी से निर्मित प्रतिमाएं विसर्जन के बाद पानी में घुल जाती हैं। ऐसे में उनकी बेअदबी नहीं होती और पर्यावरण स्वच्छता के लिहाज से भी ठीक रहता है।

adrish khan Reporting
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