दस साल में 24.71 फीसदी बढ़ी गेहूं की उत्पादकता, रकबा भी 25.19 प्रतिशत ज्यादा हो चुका

- जलवायु परिवर्तन होने से अन्य फसलों का रकबा तो बढ़ा लेकिन उत्पादन घट गया

By: gurudatt rajvaidya

Published: 30 Sep 2020, 08:03 AM IST

पत्रिका डेटा डीकोडेड
गुरुदत्त राजवैद्य, हरदा। यह कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले जिले के किसानों की मेहनत और कृषि विभाग के अमले के कुशल मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि दस साल में रबी की मुख्य फसल गेहूं की उत्पादकता में 24.71 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इसका रकबा भी 25.19 प्रतिशत ज्यादा हो चुका है। बेहतर फसल उत्पादन से किसानों की आर्थिक स्थिति में भी आशानुकूल सुधार हुआ है। हालांकि इस अवधि में कई मुख्य फसलों का रकबा तो बढ़ा, लेकिन इनकी उत्पादकता घटी है।
उल्लेखनीय है कि एक दशक के दौरान जिले की सिंचाई क्षमता में भी खासी वृद्धि हुई है। तवा नहर का कमांड एरिया बढऩे के साथ ही किसानों द्वारा सिंचाई के निजी संसाधन जुटाए जाने से रबी की मुख्य फसल गेहूं का रकबा बढ़ा है। वर्ष 2010-11 में यह जहां 129400 हेक्टेयर था, वहीं वर्ष 2019-20 में यह 162000 पर पहुंच गया। इस दौरान उपज उत्पादकता 40 क्विंटल 90 किलो से बढ़कर 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गई। वर्ष 2010-11 से 2012-13 तक तीन साल तो उत्पादकता बढ़ते गई, लेकिन वर्ष 2013-14 में यह अचानक कम होकर 31 क्विंटल 80 किलो प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई। इसके अगले साल उत्पादकता में एक बार फिर उछाल आया और यह 48 क्विंटल 12 किलो प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई थी। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2017-18 के बीच यह एक बार फिर घटी, लेकिन वर्ष 2018-19 में फिर बढ़त दर्ज कराने के साथ ही वर्ष 2019-20 में उत्पादकता अपने उच्चतम स्तर 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई। गौरतलब यह है कि जब उत्पादकता में बढ़त दर्ज हुई तब इसका रकबा कम रहा।
चना की उत्पादकता रिकार्ड 48.49 प्रतिशत बढ़ी
चना उत्पादन ने भी किसानों को मालामाल बना दिया। दस साल के दौरान इसके रकबे में तो घट-बढ़ जारी रही, लेकिन इस अवधि में उत्पादकता में रिकार्ड 48.49 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। वर्ष 2010-11 में जहां 24560 हेक्टेयर में चना की बुवाई हुई थी, वहीं वर्ष 2019-20 में इसका रकबा बढ़कर 25 हजार हेक्टेयर हो गया। इस दौरान इसकी उत्पादकता क्रमश: 16 क्विंटल 91 किलो व 25 क्विंटल 11 किलो प्रति हेक्टेयर रही। वर्ष 2017-18 में दस साल में पहली बार सबसे अधिक 56 हजार हेक्टेयर रकबे में इसकी बुवाई हुई थी। तब भी इसकी उत्पादकता 24 क्विंटल 50 किलो प्रति हेक्टेयर रही। इस वर्ष गेहूं का रकबा अब तक के न्यूनतम स्तर 1 लाख 18 हजार हेक्टेयर और उत्पादकता 44 क्विंटल 90 किलो प्रति हेक्टेयर रही थी।
उड़द की बुवाई में किसानों ने रुचि दिखाई, लेकिन नुकसान हुआ
सोयाबीन से लगातार नुकसान उठा चुके किसानों ने फसल चक्र में बदलाव कर उड़द की बुवाई में रुचि दिखाई, लेकिन उत्पादन ने निराश किया। एक दशक के दौरान जिले में उड़द का रकबा 700 एकड़ से बढ़कर 7850 हेक्टेयर पर पहुंच गया। इस अवधि में फसल उत्पादकता 5 क्विंटल से घटकर 1 क्विंटल 80 किलो प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई। दस साल के दौरान वर्ष 2017-18 में सबसे अधिक 75 हजार हेक्टेयर में उड़द की बुवाई हुई थी। तब इसकी उत्पादकता 2 क्विंटल 89 किलो थी। वहीं 2018-19 में 23790 हेक्टेयर में उड़द की बुवाई हुई थी। तब इसकी उत्पादकता अब तक का अधिकतम 9 क्विंटल 50 किलो प्रति हेक्टेयर रही थी।
सोयाबीन की उत्पादकता 1769 से 625 किलो पर पहुंची
खरीफ की मुख्य फसल सोयाबीन की उत्पादकता दस साल में बेहद कम हो गई। वर्ष 2010-11 में यह जहां 17 क्विंटल 69 किलो प्रति हेक्टेयर थी, वहीं वर्ष 2019-20 में यह 6 क्विंटल 25 किलो पर पहुंच गई। सबसे कम उत्पादकता वर्ष 2011-12 में 2 क्विंटल 39 किलो रही थी। उस दौरान जिले के 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर रकबे में इसकी बुवाई की गई थी। इस अवधि में मक्का की उत्पादकता में खासा इजाफा हुआ। वर्ष 2010-11 में 1 क्विंटल 900 किलो के मुकाबले वर्ष 2019-20 में यह 25 क्विंटल 60 किलो पर पहुंच गई। इसका रकबा भी 1700 हेक्टेयर से बढ़कर 12950 हेक्टेेयर पर पहुंच गया। वर्ष 2017-18 में उत्पादकता अधिकतम 48 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही थी। इस वर्ष 14 हजार हेक्टेयर में मक्का की बुवाई की गई थी।
इस वर्ष बढ़ सकता है चना का रकबा
उप संचालक कृषि एमपीएस चंद्रावत के अनुसार बीते रबी सीजन में 25 हजार हेक्टेयर रकबे में चना की बुवाई हुई थी। किसानों द्वारा लगातार चना बीज की मांग की जा रही है। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि तवा डैम में पर्याप्त जलभराव होने से कृषक तीसरी फसल के रूप में मूंग की बोवनी के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। इस वर्ष चने बुवाई का रकबा बढ़कर 45 हजार हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।

gurudatt rajvaidya Bureau Incharge
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