सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर हाथरस के इस राजा ने तैयार की थी आजाद हिंद फौज, जन्मदिवस पर जानिए उनके जीवन की महत्वपूर्ण बातें

सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर हाथरस के इस राजा ने तैयार की थी आजाद हिंद फौज, जन्मदिवस पर जानिए उनके जीवन की महत्वपूर्ण बातें
raja mahendra pratap singh

suchita mishra | Publish: Dec, 01 2018 12:10:00 PM (IST) | Updated: Dec, 01 2018 12:19:31 PM (IST) Hathras, Hathras, Uttar Pradesh, India

देश की खातिर तमाम यातनाएं सहीं, देश को एएमयू समेत तमाम शैक्षणिक संस्थाएं दीं। ऐसे वीर पुरुष के जन्मदिवस के मौके पर जानिए उसकी वीरगाथा।

हाथरस। जनपद हाथरस के राजा महेंद्र प्रताप सिंह अगर चाहते तो अंग्रेजों का प्रस्ताव स्वीकार कर पूरी जिंदगी बड़े ही ऐश और आराम के साथ बिता सकते थे। लेकिन उन्होंने देश को सर्वोपरि समझा। अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में बंधने के बजाय देश की खातिर यातनाएं सहना मंजूर किया। वर्षों तक देश से बाहर रहकर वे देश की आजादी के लिए संघर्षरत रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस आजाद हिंद फौज के लिए सुभाष चंद्र बोस को जाना जाता है, उसे खड़ा करने में राजा महेंद्र सिंह ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। आज 1 दिसंबर यानी उनके जन्म दिवस के मौके पर जानते हैं राजा महेंद्र सिंह के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें।

हाथरस के राजा ने लिया था गोद
राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 1 दिसम्बर 1886 को मुरसान के नरेश बहादुर घनश्याम सिंह के यहां हुआ था। लेकिन उन्हें हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने गोद ले लिया था। राजा हरिनारायण की मृत्यु केे बाद 20 वर्ष की उम्र में राजा महेन्द्र प्रताप की ताजपोशी हो गई। लेकिन अंग्रेजी निजाम ने उन्हें राजा की उपाधि नहीं दी। चूंकि जनता उनकी बहादुरी और देशभक्ति का सम्मान करती थी, लिहाजा जनता ने उन्हें शुरुआत से ही अपना राजा माना और राजा साहब कहना शुरू कर दिया था।

लंबा समय विदेश में गुजारा
राजा महेंद्र प्रताप सिंह बचपन से ही आजाद भारत का स्वप्न देखते थे, जिसको पूरा करने के लिए उन्होंने 31 वर्ष सात माह तक विदेश में रहकर आजादी का बिगुल बजाया। इस दौरान वे जर्मनी, स्विटरजरलैंड, अफगानिस्तान, तुर्की, यूरोप, अमरीका, चीन, जापान, रूस आदि देशों में घूमकर आजादी की अलख जगाते रहे। इस पर शासन ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली। उस समय भारत की आजादी के लिए हजारों देशभक्त अपनी जिंदगियां न्यौछावर कर रहे थे। जो जीवित बच जाते थे, उनको पीने के लिए पानी भी नसीब नहीं होता था। खाने के नाम पर कोड़े मिलते थे। अंग्रेजी हकूमत और देसी कारागार में उनको रात व दिन का पता भी नहीं चल पाता था। राजा महेंद्र प्रताप भी उन क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने देश की खातिर ऐसी तमाम यातनाएं सहीं।

आजाद हिंद फौज बनायी
विदेश में रहने के दौरान राजा महेन्द्र प्रताप, सुभाषचंद्र बोस से मिले और आजाद हिन्द फौज की नींव रखने में बड़ी भूमिका निभाई। विदेश में ही रहकर उन्होंने आजाद भारत की पहली सरकार का गठन किया जिसके राष्ट्रपति स्वयं बने। भारत के स्वतंत्र होने के बाद वे स्वदेश लौटे और आजाद भारत में लोकतंत्र ही आधारशिला में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1979 में भारत सरकार ने राजा साहब नाम से डाकटिकट जारी की थी। यह स्पेशल टिकट संग्रहकर्ताओं के पास आज भी सुरक्षित है।

एएमयू निर्माण के लिए जमीन दान की
राजा महेन्द्र प्रताप शिक्षा के महत्व को अच्छे से समझते थे, लिहाजा उन्होंने उस समय देश को तमाम शैक्षिक संस्थाएं दीं, जब लोग शिक्षा व्यवस्था की जानकारी भी नहीं रखते थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए उन्होंने जमीन का बड़ा हिस्सा दान किया, जिसके बाद उस जमीन पर यूनिवर्सिटी का निर्माण हुआ। वहीं राजा साहब ने मथुरा-वृंदावन में सैकड़ों बीघा जमीन को सामाजिक संगठनों एवं शिक्षण संस्थानों को दान में दे दिया था।

 

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