सात साल के बच्चे का सिर्फ 7 किलो का वजन, इसकी बीमारी जानकर आप हो जाएंगे दंग

  • यमन में दिमागी लकवा यानी सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) तेजी से फैल रहा है
  • यह बच्चाा (Cerebral Palsy) बीमारी का शिकार है

By: Pratibha Tripathi

Published: 07 Jan 2021, 09:48 PM IST

नई दिल्ली: सामान्य तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य के लिए पूरा परिवार सतर्क रहता है लेकिन यमन (Yemen) में हालात बेहद बदतर हो गए हैं। सालों से युद्ध की मार झेल रहे यमन वासियों के लिए इतने बुरे दिन आ गए हैं कि लोगों को अपने बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करना भी भारी पड़ रहा है। यहां एक दशक से गृह युद्ध की विभीषिका झेल रहे यमन वासी अब दिमागी लकवा यानी सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) जैसी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। बीते दिनों एक 7 साल के बच्चे की तस्वीीर वायरल हो रही है, जिसका वजन महज 7 किलोग्राम रह गया है।

यह तस्वीर है यमन की राजधानी सना (Sanaá) के एक अस्पैताल की, जहां अस्पताल के बिस्त र पर पड़े इस बच्चेa को देखकर किसी को भी यकीन नहीं होगा कि यह बच्चा् एक ऐसी खतरनाक बीमारी (Cerebral Palsy) का शिकार है, इस बीमारी की वजह से यह बच्चा लकवाग्रस्त (Paralyse) हो गया है, इस बच्चे की शारीरिक हरकत को देख कर ऐसा महसूस होता है जैसे यह महज छह माह का बच्चा हो।

सेरेब्रल पाल्सी के लक्षण

सबसे पहले साल 1760 में इंग्लैंड के मशहूर सर्जन डॉक्ट र विलियम जॉन लिटिल ने बच्चों में पाई जाने वाले इस असामान्यता के बारे में दुनिया को बताया था।

इस बीमारी (Cerebral Palsy Symptoms) के बारे में कहा जाता है कि बच्चों के हाथ-पैर की मांसपेशियां कड़ी हो जाती हैं। इससे पीड़ित बच्चा कोई भी काम करने और सामान पकड़ने में या फिर चलने-फिरने में असमर्थ हो जते हैं। सबसे बड़ी बात यह होती है कि पीड़ित बच्चे के दिमाग में जितना ज्यारदा नुकसान होता है उसमें विकलांगता भी उतनी अधिक देखी जाती है।

सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) एक ऐसी खतरनाक बीमारी होती है जिसमें बीमारी क्रमशह बढ़ती है और पहले 3 सालों में मस्तिष्क को होने वाले नुकसान की वजह से शरीर की मांसपेशियां कमज़ोर पड़ जाती हैं और आगे मस्तिष्क से शरीर का सामंजस्य नहीं बैठ पाता है, नतीजा शरीर में अपंगता बढ़ती जाती है। भारत में हर वर्ष 10 लाख बच्चेा इस बीमारी की चपेट में आते हैं।

आज भी लाइलाज है यह बीमारी

यह बीमारी तीन अवस्था में हो सकती है – पहला गर्भधारण के वक्त, दूसरा बच्चे के जन्म के समय और तीसरा तीन वर्ष की अवस्था में बच्चे पीड़ित हो सकते हैं। जानकारों का मानना है कि गर्भावस्था् के दौरान इस बीमारी से पीड़ित होने की आशंका सबसे ज्यानदा होती है। जानकार मानते है कि यदि गर्भावस्था् के दौरान महिला इंफेक्शन का शिकार हो जाए तो नवजात इस बीमारी से ग्रसित हो सकता है।

इस बीमारी से का सटीक इलाज आज भी नहीं हो सकता है पर इससे बचाव जरूर संभव है। कुछ दवाइयों और टेक्नोोलॉजी के अलावा ब्रेसेज के उपयोग से इससे कुछ हद तक राहत पाई जा सकती है।

Pratibha Tripathi
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