छठ पूजा 2018: छठ पूजा में ध्यान रखें ये 7 बातें, नहीं तो हो सकता है अशुभ

छठ पूजा 2018: छठ पूजा में ध्यान रखें ये 7 बातें, नहीं तो हो सकता है अशुभ

Sandeep Nayak | Publish: Nov, 10 2018 05:04:31 PM (IST) Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

11 नवंबर को मनाई जाएगी छठ पूजा

होशंगाबाद। दीपावली के बाद छठ पूजा का उत्सव मनाया जाएगा। इस बार छठ पूजा कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्थी पर 11 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन नहाय खाय के साथ छठ पूजा शुरू की जाती है जो अगले चार दोनों तक चलती है।
सूर्य उपासना के लिए प्रसिद्ध है छठ पूजा
पहला दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्थी (नहाय खाय) के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रति के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।
दूसरा दिन : व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे (खरना) कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पि_ा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है।
तीसरा दिन : कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं के अलावा चावल के लड्डू बनाते हैं। शाम को बांस की टोकरी में अध्र्य का सूप सजाया जाता है। तालाब या नदी किनारे इक_ा होकर सामूहिक रूप से अध्र्य दान संपन्न करते हैं।
चौथा दिन : सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अध्र्य दिया जाता है। व्रति वहीं पुन: इक_ा होते हैं जहां उन्होंने पूर्व संध्या को अध्र्य दिया था। पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रति तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं, व्रति घर वापस आकर गांव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहां पूजा करते हैं।

सबसे पहले कर्ण ने की थी पूजा
सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देता। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अघ्र्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। छठ पर्व सूर्य षष्ठी व डाला छठ के नाम से जाना जाता है। यह पर्व वर्ष में दो बार आता है पहला चैत्र शुक्ल षष्ठी को और दूसरा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को, हालांकि षष्ठी तिथि को मनाया जाने के कारण छठ पर्व कहते हैं लेकिन यह पर्व और इसकी पूजा सूर्य से जुड़े होने के कारण सूर्य की आराधना से ताल्लुक रखने के कारण इसे सूर्य षष्ठी कहते हैं। इसमें भगवान सूर्य के अलावा उनकी छोटी बहन छठ मैय्या की उपासना की जाती है। इनके बारे में मान्यता है कि यह बड़ी ही दुलाली होती है और छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाती हैं। इसलिए छठ पूजा के दौरान कई बातों का ध्यान रखना चाहिए।

 

पूजा में बरतें ये 7 सावधानियां
- छठ मैय्या का प्रसाद बनाते समय पवित्रता का ध्यान रखें।
- प्रसाद तैयार करने वाले को प्रसाद तैयार होने तक तक कुछ नहीं खाना चाहिए।
- प्रसाद को पैर नहीं लगाना चाहिए।
- सूर्य को अघ्र्य देते समय चांदी, स्टील, शीशा व प्लास्टिक के बने बर्तनों से अघ्र्य नहीं देना चाहिए।
- मैय्या की मनौती को नहीं भूलना चाहिए। जो मनौती हो उसे समय पर पूरा कर लेना चाहिए।
- प्रसाद जहां बन रहा हो वहां भोजन नहीं करना चाहिए। इससे पूजा अशुद्ध माना जाता है।
- व्रत करने वाले को कभी भी बुरा भला नहीं कहना चाहिए। ऐसा करने से पूजा का लाभ आपको नहीं मिलता।

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