गेहूं उत्पादन और किस्मों में इस जिले ने पंजाब को पछाड़ा

गेहूं उत्पादन के लिए पूरे देश में मिली पहचान, यहां की मिट्टी का नहीं है कोई मुकाबला, हरित क्रांति की प्रदेश में यहीं से हुई थी शुरुआत..

By: Shailendra Sharma

Published: 27 Sep 2020, 10:41 PM IST

होशंगाबाद. होशंगाबाद जिले ने गेहूं उत्पादन और गेहूं की किस्मों को लेकर पंजाब राज्य को पीछे कर दिया है। जिले में स्थित सवा सौ साल पुराने कृषि अनुसंधान केन्द्र का अहम योगदान रहा है और इतने सालों बाद भी अनुसंधान केन्द्र उसी रफ्तार से काम कर रहा है। जिले काली-दोमट मिट्टी का कोई मुकाबला नहीं है और जब से यहां तवा बांध बना और सिंचाई की व्यवस्था हुई तो अनुसंधान केन्द्र ने इसी को ध्यान में रखकर समय पर गेहूं की कई वैरायटियां तैयार कीं जिनका उपयोग कर जिले के किसान गेहूं की बंपर पैदावार लेते हैं।

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गेहूं उत्पादन से नर्मदापुरम को मिली नई पहचान
गेहूं के बंपर उत्पादन के कारण होशंगाबाद को प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश को सिरमौर बना दिया है। अगर यह कहें कि पंजाब जैसे राज्य की बराबरी में जिले के किसानों की मेहनत ही है, जिससे आज प्रदेश व पूरे देश में गेहूं के सर्वाधिक उत्पादन, उत्पादकता में नर्मदापुरम् संभाग अव्वल हो रहा है। होशंगाबाद का गेहूं स्वाद के लिए पूरे देश में मशहूर है और बंपर पैदावार से किसान भी खासे लाभांवित होते हैं।

 

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देश का सबसे पुराना अनुसंधान केंद्र है पवारखेड़ा
नेशनल हाइवे-69 इटारसी रोड किनारे पवारखेड़ा कृषि अनुसंधान केंद्र देश का सबसे पुराना अनुसंधान केंद्र है। जो आज भी उसी रफ्तार से काम कर रहा है। इसकी स्थापना वर्ष 1903 में हुई थी। यानी यह करीब 115 साल पुराना केंद्र है। यहां से करीब 16 सौ गेहूं की उन्नत किस्में अब तक निकल चुकी है। जो जिले के किसानों के लिए बहुत ही कारगर साबित हुई है। यही नहीं गेहूं किस्मों के छह हजार जर्म प्लाज भी विकसित किए गए हैं। इसलिए इस केंद्र को गेहूं का जीन बैंक कहा जाता है।

 

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इन किस्मों ने पंजाब की बराबरी पर लाया
कृषि उप संचालक जितेंद्र सिंह बताते हैं कि गेहूं उत्पादन में पवारखेड़ा अनुसंधान केंद्र किसानों के लिए बेहद मददगार साबित हुआ है। पिछले सालों में गेहूं की उत्पादकता में होशंगाबाद जिला पंजाब राज्य के बराबर आ गया। होशंगाबाद और हरदा दोनों बराबरी इसके लिए हकदार हैं। आज गेहूं की उत्पादकता 50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर हो चुकी है, जो कि पंजाब के बराबर है। प्रमुख नई किस्में देखें तो जिले से निकली मोटे दाने की जीडब्ल्यू 451, जीडब्ल्यू 463, जीडब्ल्यू 322, एचआई 8759 सर्वाधिक , पूसा अनमोल, एचआई 1544, जेडब्ल्यू 3382, जेडब्ल्यू 3288, एमपी 1201, 1202, 1203 ने किसानों की समृद्धि के साथ जिले का नाम भी रोशन किया है।

 

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सर्वश्रेष्ठ उत्पादकता का कारण
जिले में गेहूं उत्पादकता सर्वश्रेष्ठ इसलिए है क्योंकि यहां सिंचाई क्षमता बहुत ही अच्छी है। तवा बांध और नर्मदा किनारे जिले के होने से एरिया पूरा सिंचित है। यानी कुल सौ फीसदी में से 92 प्रतिशत एरिया सिंचित है जो मप्र में सर्वाधिक सिंचित एरिया है। रबी का कुल एरिया 3 लाख 30 हजार हैक्टेयर है, इसमें 3 लाख 10 हजार हैक्टेयर में सर्वाधिक गेहूं की खेती होती है। यहां की मिट्टी बेहद उपजाई है। मिट्टी दोमट काली मिट्टी है। जिसकी उर्बरा शक्ति सर्वाधिक है। किसानों का जागरुक होना भी उपलब्धि का एक कारण है। बीज की उन्नत किस्मों का उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसा के अनुरूप किसानों व्दारा मिट्टी का समय-समय पर परीक्षण कराकर उर्वरकों का संतुलित उपयोग बेहतर उत्पादन में सहायक बना हुआ है।

 

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10 हजार हैक्टेयर में हो रही जैविक खेती
लगातार रासायनिक खाद के दुष्प्रभाव से जिले की मिट्टी पर भी असर पड़ा है। समय रहते किसान जागरूक हुए और यही वजह है कि जिले में अब करीब 10 हजार हैक्टेयर में करीब 5 हजार किसान जैविक खेती कर रहे हैं। किसानों ने नरवाई को जलाना बंद कर दिया है। फसल अवशेष प्रबंधन को अपनाकर गेंहू व धान की कटाई के बाद जो अवशेष (नरवाई) निकलती है उसे किसान खेत को बखरकर मिट्टी में ही मिला देते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में इजाफा होता है। ये किसान अब खुद के लिए जैविक उत्पाद भी उत्पादित कर रहे हैं।

 

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लगातार तीन सालों से कृषि कर्मण अवार्ड मिल रहा
होशंगाबाद जिले के लिए सबसे गर्व की बात यह है कि लगातार तीन सालों से देश का सबसे बड़ा कृषि कर्मण अवार्ड जिले को ही मिल रहा है। इस अवार्ड को दिलाने में जिले की सोमलवाड़ा की महिला उन्नत किसान कंचन वर्मा, पथरौटा इटारसी की शिवलता मेहता और पिपरिया की अरुणा जोशी का अहम योगदान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन तीनों महिला किसानों को इस अवार्ड से दिल्ली में सम्मानित किया है।

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