दुल्हन की तरह सजाकर मां की भांति पूजा फिर दूसरे दिन गंदगी मिलाने खोल दिए नाले के फाटक

नर्मदा जयंती के दूसरे दिन सीवेज छोड़ दिया नदी में

By: बृजेश चौकसे

Published: 26 Jan 2018, 12:46 PM IST

होशंगाबाद। कई दिनों तक तैयारी की गई। शहरभर ने मिलकर दुल्हन की तरह सजाया, संगठनों ने मां की उपमा देकर दूर दराज और अन्य राज्यों में रह रहे अपने परिचितों को आमंत्रण देकर मां नर्मदा की नगरी में बुलाया। कि वह भी यहां आकर मां नर्मदा को नमन कर उसके जल से आचमन करें। हुआ भी कुछ ऐसा ही, स्वयं सीएम शिवराजसिंह चौहान ने सेठानी घाट पर पहुंचकर मां नर्मदा का गुणगान किया। लेकिन नर्मदा जयंती के दूसरे दिन स्थिति ठीक उलट रही। अलसुबह ही शहर की गंदगी के नाले के फाटक नर्मदा नदी में ही खोल दिए गए। जीहां जयंती के दिन नर्मदा का दूध से अभिषेक किया गया और अगले ही दिन गुरुवार सुबह पर्यटन कोरीघाट स्थित नाले से शहर की गंदगी नदी में छोड़ दी गई। सूत्रों ने बताया कि चोरी-छिपे तड़के ही लोगों से जागने से पहले नपा नाले के फाटक खोलकर शहर का सीवेजे नर्मदा नदी में छोड़ देती है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।



measures to prevent dirt in narmada in hoshangabad madhya pradesh news

नर्मदा जयंती पर नपाध्यक्ष ने सीढिय़ों से किया था अभिषेक, यह थी उनकी दलील
नर्मदा जयंती के दिन सीएम ने भले मंच से अभिषेक किया हो लेकिन नपाध्यक्ष अखिलेश खंडेलवाल ने सीढिय़ों पर बैठकर नर्मदा का अभिषेक किया। इस उन्होंने कहा था कि वह मंच पर नहीं चढ़ते हैं। उनकी मान्यता है कि नर्मदा के ऊपर पैर नहीं रखेंगे। और आज उसी के दामन में शहर की गंदगी नपा की तरफ से डाली जा रही है।

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इस पाप का जिम्मेदार कौन? (ब्रजेश चौकसे)
नर्मदा नदी में करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास है। मुख्यमंत्री से लेकर नर्मदांचल का हर शख्स उसके आगे शीश झुकाता है। यह नदी सरकार के मुख्य एजेंडे में भी शामिल है। उस पर मध्यप्रदेश सरकार अरबों रुपए खर्च भी कर चुकी हैं। प्रदूषण मुक्त करने नर्मदा किनारे छह करोड़ पौधे लगाए गए हैं। सरकार ही नहीं होशंगाबाद के प्रथम नागरिक ने तो उसके प्रदूषण मुक्त होने तक पादुकाएं त्याग रखी हैं। नंगे पैर चल रहे हैं। लेकिन उनकी ही नाक के नीचे या यूं कहें कि उनकी मर्जी से ही उनका अधीनस्थ अमला लोगों की आस्था को चोट पहुंचा रहा है। चोरी-छिपे शहर के जागने से पहले नर्मदा में सीवेज छोड़ रहा है। आखिर यह गुनाह क्यों किया जा रहा है, इस 'पापÓ का जिम्मेदार कौन है? वो सरकार जिसने इसके सीवेज ट्रीटमेंट प्लान के लिए 135 करोड़ रुपए मंजूर कर दिए हैं? या वो अफसर जो मंजूरी के बाद भी इसकी फाइलें कछुआ गति से चला रहे हैं या फिर इस शहर के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और नगर पालिका? जिन्हें इस फाइल को गति देने का हर जतन करना चाहिए और उसे अमलीजामा पहनाने में तनिक भी देरी नहीं करना चाहिए, लेकिन वे तमाशाबीन बने हुए हैं। आस्था का ढोंग और चिंता का दिखावा कर रहे हैं। वैसे तो नर्मदांचल ने प्रदेश की राजनीति में कई पावर फुल नेता और अफसर दिए हैं, जो चाह भर लें तो चंद दिन तो दूर चंद घंटों में यह योजना धरातल पर आकार लेती दिखने लगे। लेकिन पहल करे कौन? क्या, यह जरूरी नहीं है कि हर शख्स से जुड़े इस एक मुद्दे पर ही सही सभी नेता अपने-अपने राग और द्वेष तथा राजनीतिक नफा-नुकसान.. सबको तिलांजलि देकर एक हो जाएं। सिर्फ एक होने का दिखावा न करें और न ही बेमन से इस पवित्र काम को पूरा करने का अपवित्र प्रयास करें। बल्कि उस साधू संत की तरह पूरी आस्था से जुट जाएं, जो यह जानते हुए भी रोजाना घाट पर आचमन करता है कि उसमें शहर की गंदगी मिल रही है। उसका अटूट विश्वास है कि इस पवित्र नदी में मिलने के बाद नाले का पानी भी पवित्र हो गया है। लेकिन यह नहीं जानता कि वर्षों से इसका आचमन करने वाले और इससे तन धोने वालों का इसके प्रति ही मन साफ नहीं हो पाया है। अब भी समय है, इस नेक काम में जुट जाइए, वरना हो सके, छह माह बाद जब आप जागों तो देर हो चुकी हो और देर भी इतनी हो जाए कि इस पवित्र काम का फल भी कोई ओर ले जाए और श्रेय भी।

बृजेश चौकसे
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