हाल-ए-सरकारी अस्पताल, खाली पड़े प्राइवेट वार्ड, और धूल खा रहे पलंग

sandeep nayak

Publish: Apr, 17 2018 06:06:31 PM (IST)

Hoshangabad, Madhya Pradesh, India
हाल-ए-सरकारी अस्पताल, खाली पड़े प्राइवेट वार्ड, और धूल खा रहे पलंग

नए प्राइवेट वार्डों में लगे ताले

इटारसी। सरकारी अस्पताल में बनाए गए प्राइवेट वार्ड का तय किया गया 500 रुपए प्रतिदिन का किराया वार्ड लेने वालों के मंसूबों पर भारी पड़ रहा है। रोगी कल्याण समिति ने इन वार्डों का किराया तय तो कर दिया है मगर हकीकत यह है कि इन वार्डों को लेने में इक्का-दुक्का लोग ही रुचि दिखाते हैं। हालात यह हैं कि नए प्राइवेट वार्डों में ताला बंद हैं और कमरों में अंदर पलंग धूल खा रहे हैं।
अस्पताल को रहा नुकसान : डीएसपीएम अस्पताल परिसर में प्राइवेट वार्ड बनाने के पीछे यह मंशा थी कि इन प्राइवेट वार्डों को किराए से चलाकर रोगी कल्याण समिति की आय में इजाफा किया जा सकेगा मगर हकीकत बहुत कड़वी है। यह प्राइवेट वार्ड रोगी कल्याण समिति की आय में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं ला पाए हैं। प्राइवेट वार्डों से आय के नाम पर कोई बहुत बड़ी राशि अस्पताल प्रबध्ंान को नहीं मिल रही है। अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक अब तक इन प्राइवेट वार्डों से इतने सालों में बमुश्किल 2 लाख रुपए ही मिल पाए हैं। वहीं अस्पताल अधीक्षक डॉ. एके शिवानी ने बताया कि अस्पताल में प्राइवेट वार्ड उपलब्ध हैं मगर मरीजों के परिजन उन्हें लेने से पीछे हटते हैं। बहुत ज्यादा लोगों में प्राइवेट वार्ड के प्रति रुचि नहीं रहती है। जो मांगता है उसे रसीद काटकर प्राइवेट वार्ड दे दिया जाता है। किराया रोकस ने ही तय किया है।

भाड़े ने किया मजबूर
सरकारी अस्पताल में उपचार के लिए आने वाले मरीज गरीब और मध्यम वर्गीय होते हैं। उनकी स्थिति को देखते हुए प्रबंधन ने पहले 300 रुपए प्रतिदिन किराया तय करने की योजना बनाई थी मगर प्राइवेट वार्डों के मेंटनेंस को देखते हुए रोगी कल्याण समिति की बैठक में किराया 500 रुपए प्रतिदिन तय कर दिया गया। खास बात यह है कि तय किया किराया अस्पताल में आने वाले मरीजों को भारी पड़ता है इसलिए वे जनरल वार्ड में ही भर्ती हो जाते हैं। अब तक ऐसा मौका कभी नहीं आया है कि सभी प्राइवेट वार्ड एक साथ हर माह बुक हुए हों।

25 लाख खर्च, बने 10 कमरे
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी अस्पताल के लिए 10 प्राइवेट वार्डों की स्वीकृति हुई थी। यह वार्ड करीब २५ लाख रुपए की लागत से बनाए गए थे। वर्ष 2012 में यह प्राइवेट वार्ड बनकर तैयार हो गए थे। इन वार्डों के बनकर तैयार होने के बाद यह उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में अस्पताल में दो दिन गुजारने के लिए आने वाले मरीज इन वार्डों का उपयोग कर सकेंगे, मगर प्रबंधन ने जो सोचा था वह कुछ भी नहीं हुआ। इस तरह नुकसान भी हो रहा है।

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