इस शोधकर्ता ने रानी की वाव पर की पीएचडी, मिला सौ रुपए के नोट पर स्थान

क्या है रानी की वाव, जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

By: poonam soni

Updated: 10 Mar 2019, 08:03 PM IST

होशंगाबाद। देश में ऐसे कई शोधकर्ता है जिन्होनें कई धरोहरों पर पीएचडी की हुई हैं। ऐसे ही एक शोधकर्ता है जिन्होने रानी की वाव पर पीएचडी की। अब आप ये सोच रहें होगें की क्या है आखिर ये रानी का वाव...तो हम आपको बताते है कि रानी का वाव सौ के नए नोट पर बनी एक तस्वीर जिसे रानी का वाव कहते हैं। डॉ. नारायण व्यास उज्जैन के रहने वाले हैं। डॉ. व्यास ने प्रदेश से लेकर देश और विदेश तक पुरातत्व के क्षेत्र में अपने अलग पहचान बनाई है। उन्हें लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड, गोल्डन बुक ऑफ रिकार्ड, इंडिया स्टार ऑफ बुक, राजभाषा सहित दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं।

डॉ. व्यास ने बताया कुछ ऐसा
मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अपने सेवाकाल के दौरान 1981 से 1988 तक वडोदरा में पदस्थ था। उस समय पाटन गुजरात में विभाग की ओर से वाव का शोध कार्य एवं उसमें लगी प्रतिमाओं के डॉक्यूमेंडेशन का कार्य सौंपा। आज यह वाव यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है। कार्य से पूर्व वाव गिरी थी। मैंने वहां बहुत खुदाई की। कई मूर्तियां और पत्थर निकले। इस दौरान कई बार जोखिम भी उठाया। करीब 70 से 80 फीट पानी का लेवल रहा। वाव काफी नीचे जमीन के अंदर तक थी। इसके बाद मेरे गुरु ने मुझे इसी वाव पर पीएचडी करने का सुझाव दिया। यह जानकारी डॉ. नारायण व्यास ने दी। उन्होंने करीब पांच वर्ष तक शोध कर 1992 में रानी के वाव पर पीएचडी की। इसी रानी के वाव को भारत सरकार ने 100 रुपए के नोट में स्थान दिया।

प्राचीन सामग्रीयों का कलेक्शन भी
डॉ. नारायण व्यास ने बताया कि उन्होने कई सालो से देश विदेश के ईटो, सिक्के, पुरानी किताबे, 120 देशों की डाक टिकटों का कलेक्शन भी किया। जिसमें उन्हे कई सारे बल्र्ड रिकार्ड से नवाजा गया है।

इतिहास का दस्तावेजीकरण भी सीखा बच्चों ने
शैलचित्र कला प्रागैतिहासिक काल के सांस्कृतिक इतिहास के महत्वपूर्ण पुरातात्विक आधार हैं। शैलचित्रों का अध्ययन इतिहास की विकास यात्रा को अभिव्यक्त करता है। विदेशों में पुरातत्व को विज्ञान कहा जाता है। शैलचित्रों को और उनके इतिहास को व्यवस्थित व संरक्षित करना होगा। यह बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शैलचित्र कला को पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध पुरातत्व वेत्ता डॉ. नारायण व्यास ने नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय में इतिहास पर आयोजित कार्यशाला के पांचवें दिन कही। पुरातत्वविद साधना व्यास ने भी पुरातत्व के माध्यम से इतिहास के दस्तावेजीकरण पर बताया। कार्यक्रम के दौरान शैल चित्रों पर क्विज और ड्राइंग कॉम्पटीशन भी हुआ। डॉ. बीसी जोशी ने कहा होशंगाबाद में शैल चित्रों की समृद्ध शृंखला है। पुरातत्व ही वास्तविक इतिहास है। दर्शनशास्त्र की प्राध्यापक डॉ. विनीता अवस्थी ने कहा जब अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं थे, तब का इतिहास इन शैलचित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। डॉ. हंसा व्यास ने बताया कि इन शैल चित्रों की रेखाएं और रंग तत्कालीन समय की विषय-वस्तु के साथ इतिहास के अध्याय लिखते हैं। ये शैल चित्र मानव के विकास की गाथा है। वैशाली भदौरिया ने कहा कि शैलचित्र भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। इनके रंगों में जीवन समाया है। इनका संरक्षण आवश्यक है। कार्यक्रम में डॉ. एससी हर्णे, डॉ. नारायण अडलक, डॉ. रश्मि तिवारी, डॉ. आशा ठाकुर, डॉ. ममता गर्ग, डॉ. सविता गुप्ता, आरती सिंह, आरती रावत, प्रियंका राय, रेणुका ठाकुर, डॉ. संजय चौधरी, डॉ. राजेश दीवान, डॉ. बोहरे, डॉ. कल्पना जम्बूलकर सहित विद्यार्थी उपस्थित रहे।
विद्यार्थियों ने किए सवाल : पुरात्तव सामग्री की खोज में कठिनाई आती है। लिपियों को कैसे पहचाना जाता है। बारिश के पानी को बचाने ड्रेनेज सिस्टम बनाया जाए। पहाडिय़ा की खोज 1920 में मनोरंजन घोष, पर्सी ब्राउन ने की। शैक्षणिक भ्रमण पर जाने क्या-क्या सामग्री साथ होना चाहिए। जैसे कई सवाल विद्यार्थियों ने किए, जिनका पुरात्तववेत्ताओं ने जवाब दिया।
प्रेक्टिकल के लिए दिखाई पहाड़ी
डॉ. नारायण व्यास ने कार्यशाला में भाग लेने आए विद्यार्थियों को आदमगढ़ की पहाड़ी पर प्रेक्टिकल के लिए लेकर गए। ताकि विद्यार्थी पुरातत्व की चीजों को करीब से जान सकें। डॉ. व्यास ने विद्यार्थियों को पहाड़ी और उसके पुरातत्व महत्व के साथ ही कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।

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