जिम्मेदारों ने आर्कलॉजिकल संघ को भुलाया, खतरे में पुरातात्विक धरोहर

बीस साल से नहीं हुई संघ की बैठक, पहले होती थी हर दो माह में बैठक

मनोज अवस्थी/होशंगाबाद। जिले में सैकड़ों दर्शनीय और पर्यटन स्थल हैं, जहां पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। लेकिन ऐसे स्थलों की उपेक्षा से ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों का अस्तित्व मिटता जा रहा है। पहाडिय़ों और जंगलों को काट कर नष्ट किया जा रहा है। पुरा अवशेष खत्म होते जा रहे हैं। यह सब हो रहा अधिकारियों द्वारा इस क्षेत्र में ध्यान न देने से। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले में स्टेट ऑर्कलॉजीकल संघ होने के बाद भी पिछले करीब बीस वर्ष से इसकी बैठकें बंद हैं। अधिकारियों की अनदेखी पुरातत्विक धरोहरों पर भारी पड़ रही है। बनखेड़ी स्थित फतेहपुर का किला खंडहर में तब्दील हो गया है, होशंगाबाद का हुशंगशाह का किला और आदमगढ़ की पहाडी़ भी उपेक्षा की शिकार है। पुरातत्व संग्रहालय की ओर भी ठीक से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यही हाल अन्य पुरातात्विक घरोहरों का है।

राज्य शासन की उपेक्षा भी जिम्मेदार
पुरातत्वविद् बताते हैं सैकड़ों वर्ष पहले ध्वस्त हुए यहां के मंदिर के पीछे जितने तात्कालिक कारण रहे हों, उससे कहीं अधिक इन मूर्तियों को नष्ट करने में राज्य शासन की उपेक्षा भी जिम्मेदार है। होशंगाबाद जिले में भी भोपाल की तरह रॉक पेंटिंग का भंडार है बस जरूरत है उसे संरक्षित कर लोगों के सामने लाने की। पुरात्व के प्रति लोगों की रुचि घटती जा रही है। प्रशासन की ओर से स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए इस क्षेत्र से जोडऩे के संबंध में कोई भी प्रयास नहीं किया जा रहे हैं।

 

यह है जिले की पुरासंपदा
अंग्रेजों के समय का राजा भबूत सिंह का किला पचमढ़ी, महाभारत काल की पांंडव गुफा पचमड़ी, भगवान शंकर की प्राचीन गुफा मोनेश्वर धाम बनखेड़ी, फतेहपुर का किला बनखेड़ी, हुशंगशाह का किला होशंगाबाद, आदमगढ़ की पहाडी़, तवा और नर्मदा का संगम स्थल बांद्राभान, मढई, पुरातत्व संग्रहालय, सतपुड़ा रिजर्व टाइगर, पचमढ़ी, सूरज कुंड सेठानी घाट के अलावा सैकड़ों वर्षों पुराने भवन भी हैं जिन्हें सहेजने की जरूरत है।

पुरातात्विक और धार्मिक महत्व
यहां के बांद्राभान, सूरज कुंड और सेठानीघाट धार्मिक व दर्शनीय स्थल, सहित पुराने भवन और कुछ मंदिरों का अपने आप में एक अनूठा स्थान है, जो पुरातात्विक स्थल होने के साथ ही यहां के लोगों की आस्था का केंद्र भी हैं। इतिहासकार इसे पुरातात्विक धरोहर मानते हैं।

 

पुरातत्ववेता डॉ. नारायण व्यास ने बताया कि इस क्षेत्र में पुरासंपदा बिखरी पड़ी है। रॉक पेंटिंग का भी भंडार है। इन स्थानों पर ध्यान देकर संरक्षित करने की जरूरत है। यहां का स्टेट आर्कलॉजीकल संघ सुसुप्त अवस्था में है उसे जाग्रत करने की जरूरत है। बीस साल पहले हर दो माह में स्टेट ऑर्कलॉजीकल विभाग की मीटिंग होती थी। इसमें जिले के अंदर पुरातत्व का विकास कैसे करें, पुरासंपरा को किस तरह संरक्षित कर सकते हैं सहित अन्य बिंदुओं पर चर्चा होती थी, इसमें कलेक्टर, पुरातत्ववेत्ता, संबंधित विषय के कॉलेज के प्रोफेसर और जिले के गणमान्य नागरिक जो इसके सदस्य होते हैं उपस्थित रहते थे, और अपनी-अपनी राय देते थे।

- पहले सेमिनार आयोजित होते थे। संघ के चुनाव भी होते थे, लेकिन अब सब बंद पड़ा है। ऑर्कलॉजी को सक्रिय होना चाहिए। साथ ही इसका प्रचार प्रसार होना चाहिए। आदमगढ़ की पहाडिय़ा पर जो फीस ली जा रही है वह बंद होनी चाहिए। पुरातात्विक जगह पर विद्यार्थियों की एक्टीविटीज भी होनी चाहिए।
डॉ. वीसी जोशी, प्रोफेसर एवं सदस्य ऑर्कलॉजीकल संघ

- वर्तमान में संघ में अधिकारी नहीं है जो अधिकारी था उसे सस्पेंट कर दिया गया है। मैं प्रभारी के रूप में काम देख रहा हूं। मेरे चार जगह की और जिम्मेदारी है। इस कारण इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है। 20 दिन के अंदर अधिकारी की पोस्टिंग हो जाएगी, तो नियमित रूप से मीटिंग होगी और पुरातात्विक धरोहरों की ओर ध्यान दिया जाएगा।

सुनील पाघ्ये, इंचार्ज संग्रहाध्क्ष, पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय होशंगाबाद

मनोज अवस्थी
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