37 इंच बारिश के बाद भी नर्मदा की एक दर्जन सहायक नदियां सूखी, सिर्फ जहां रेत वहां दिख रहा पानी

37 इंच बारिश के बाद भी नर्मदा की एक दर्जन सहायक नदियां सूखी, सिर्फ जहां रेत वहां दिख रहा पानी
37 इंच बारिश के बाद भी नर्मदा की एक दर्जन सहायक नदियां सूखी, सिर्फ जहां रेत वहां दिख रहा पानी

Sandeep Nayak | Updated: 22 Aug 2019, 01:05:10 PM (IST) Hoshangabad, Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

अवैध रेत उत्खनन से दम तोड़ रहीं नदियां

शकील नियाजी/ पिपरिया। नदियों से हो रहे बेहताशा अवैध रेत उत्खनन और आसपास के जंगल से पेड़ों की अवैध कटाई के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। जिले में 37 इंच से अधिक बारिश हो चुकी है, पिछले साल की तुलना में 14 इंच अधिक बावजूद नर्मदा नदी की एक दर्जन सहायक नदियां सूखी पड़ी हैं। इनमें उन्हीं जगहों पर पानी के कुंड नजर आ रहे हैं, जहां रेत पर्याप्त मात्रा में है। यह हाल तब है जब तीन साल बाद भरपूर बारिश होने पर तवा बांध के दो बार गेट खोलना पड़े। पिपरिया-जबलपुर की दिशा में आगे रामपुर के पास बड़ी कोरनी नदी सूखी है जो हजारों ग्रामीणों के लिए पानी का एक मात्र माध्यम होती थी। इसमें जहां रेत की परत बेहतर है वहां जरुर पानी के कुण्ड भरे नजर आ जाएंगे।

यह नदियां सूखी
पिपरिया : जमाड़ा, बांसखेड़ा, बीजनबाड़ा, कुम्हावड़, मोकलवाड़ा, में एक बूंद पानी नहीं है। बनखेड़ी की दूधी, ओल नदी के कई हिस्से सूखे हैं।
सिवनी मालवा : मोरन नदी, गंजाल नदी, कंदेली नदी, इंदना चांदना नदी, हथेड़ नदी।

 

 

इस कारण दम तोड़ रहीं नदियां
जल विशेषज्ञ मनोज राठी का कहना है कि नदियां अपने उद्गम स्थलों पर ही दम तोड़ रही हैं, इसका प्रमुख कारण जंगलों का कटना है। क्योंकि पेड़ की जड़ों से पानी सुरक्षित रहता है लेकिन इमारती लकड़ी, उद्योग, सड़क, जलाउ लकड़ी के नाम पर जंगल खत्म किए जा रहे हैं। पेड़ों की जड़ों से नदी में जल भराव रहता है। दूसरी बड़ी वजह नदी से रेत का बेहिसाब उत्खनन हो रहा है। नदी की रेत में डेढ़ प्रतिशत पानी जमा रहता है रेत माफियाओं ने रेत के साथ नदियों को मिट्टी की सतह तक खोद डाला है। नदी से रेत तो गायब हो गई। मिट्टी भी निकल आई इसमें बारिश का पानी रुकता नहीं है। इस वजह से जहां रेत नहीं बची वहां नदियां सूख रही हैं। इन नदियों को बचाना है तो सघन वन विकसित करना होंगे साथ ही रेत उत्खनन पर सख्ती से लगाम लगाना होगी।

 

पानी सहजने में अक्षम हैं हम
इंडियन वॉटर पोर्टल के अनुसार देश को सालाना 3 हजार घनमीटर पानी की आवश्यकता है और बारिश से हमें सालाना 4 हजार घनमीटर पानी मिलता है इसके बावजूद जल संकट है। इसका कारण है वर्षा जल का संचयन नहीं हो पाना है। जल संशोधन एवं पुन: जल को उपयोगी बनाने में हम अक्षम हैं। जबकि इजराइल में अन्य देशों से बारिश का प्रतिशत कम है लेकिन यह देश बारिश के पानी का 100 फीसदी संचयन करता है। जल संशोधन कर उसका 94 फीसदी घरों में उपयोग में लिया जाता है।

 

बारिश का पानी संग्रहित करने सजग होना पड़ेगा
भूजल स्तर का दोहन होने से वॉटर लेवल काफी नीचे चला गया है। नदियों की रेत के अंदर पानी चलता है रेत नदियों से निकाल ली गई। हम बारिश का पानी सहेज कर जमीन को नहीं दे रहे हैं, जिससे लगातार वॉटर लेवल गिरता जा रहा है। नदी में पानी तभी रुके जब वॉटर लेवर नदी के बराबर हो। पहले 60-70 फीट पर हैंडपंप पानी देता था अब 200 फीट पर पिपरिया में हैंडपंप नहीं चल रहे। सभी का बारिश का पानी संग्रहित करने जमीन को पानी देने के प्रति सजग होना पड़ेगा तभी बारिश में नदियों में पानी दिखेगा।
केजी व्यास, मप्र जल संरक्षण समिति अध्यक्ष

इनका कहना है
पिपरिया, बनखेड़ी क्षेत्र में आधा दर्जन से अधिक छोटी नदियां है इनमें अच्छी बारिश होने के बाद भी पानी नहीं है। कुछ नदियों में रेत लेयर पर्यप्त होने पर कुंडों में कुछ जल भराव दिख रहा है जहां रेत नहीं है वहां जल भराव नहीं है। जलसंकट को दूर करने समग्र प्रयास जरुरी हैं।

एसके रामावत, एसडीओ तवा परियोजना

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