रियल चैंपियन : हॉकी लगने से टूटी गर्दन की हड्डी, आंतों में हो गया छेद लेकिन नहीं मानी हार

भारतीय हॉकी प्लेयर विवेक सागर ने चुनौतियों से नहीं मानी हार...जिंदगी का मैच जीतने के बाद मलेशिया में भारतीय टीम को दिलाई यादगार जीत...

By: Shailendra Sharma

Published: 14 Jul 2021, 04:21 PM IST

होशंगाबाद. एक खिलाड़ी की जिंदगी आसान नहीं होती। तमाम मुश्किलों और अटूट मेहनत से चैंपियन बनते हैं। ये बात आपने अक्सर सुनी होगी लेकिन हम आपको आज एक ऐसे चैंपियन के बारे में बता रहे हैं जिसने मैदान के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर भी चुनौतियों का डटकर सामना किया। इस चैंपियन का नाम है विवेक सागर। विवेक भारतीय हॉकी खिलाड़ी हैं और होशंगाबाद जिले के इटारसी से 10 किमी दूर चांदौन गांव के रहने वाले हैं। एक घटना के बाद मौत को हराकर मैदान पर लौटने वाले विवेक ने भारत की जूनियर हॉकी टीम का मलेशिया में हुई प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व तो किया ही शानदार प्रदर्शन करते हुए खुद मैन ऑफ द सीरीज बने व भारत को सीरीज भी जिताई।

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2015 में प्रैक्टिस के दौरान टूटी गर्दन की हड्डी
भारतीय हॉकी खिलाड़ी विवेक सागर ने मैदान के भीतर ही नहीं बाहर भी चुनौतियों का डटकर सामना किया है। साल 2015 में प्रैक्टिस के दौरान विवेक की गर्दन की हड्डी टूट गई थी। अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती किया तो दवाइयों के हेवी डोज से पेट की आंतों में छेद हो गया। 22 दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझते विवेक ने आखिरकार जिंदगी का मैच भी जीत लिया। इसके बाद जूनियर हॉकी टीम की मलेशिया में कप्तानी की और मैन ऑफ द सीरीज पर कब्जा जमाया। वर्ष 2014-15 में विवेक पहला जूनियर इंडिया कैंप करके लौटे थे। 2016 में जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप की तैयारी भोपाल ऐकेडमी में कर रहे थे। प्रैक्टिस के दौरान एक अन्य खिलाड़ी की हॉकी लगने से उनकी गर्दन की हड्डी टूट गई। इसी वजह से जूनियर वर्ल्ड कप में सिलेक्शन नहीं हुआ। विवेक को भोपाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां दवाइयों के हेवी डोज से पेट की आंतों में छेद हो गया था। डॉक्टरों ने उनके खाने-पीने पर पाबंदी लगा दी थी, सिर्फ ग्लूकोज और दवाइयों के सहारे इलाज चला। परिजनों ने ढ़ांढ़स बंधाया, विवेक ने भी हौसला नहीं खोया। इतनी जल्दी स्वस्थ होने पर डॉक्टरों ने भी आश्चर्य जताया था।

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ऐसे शुरु हुआ हॉकी का सफर
विवेक ने पत्रिका से हुई खास बातचीत में बताया कि चांदौन गांव से करीब 2 किमी दूर आयुध निर्माणी का खेल परिसर है। यहां सीनियरों को हॉकी खेलते देखकर ही हॉकी के प्रति लगाव बढ़ा। इसके बाद सीनियरों से हॉकी स्टिक और दोस्तों से शूज मांगकर मिट्टी वाले ग्राउंड में प्रैक्टिस की। जबकि नेशनल और इंटरनेशनल मैच टर्फ पर खेले जाते हैं। उन्होंने कहा-शुरुआती दौर में प्रशिक्षकों की कमी भी रही। विवेक बोले- कभी भी गिव अप न करें, कड़ी मेहनत करें और खुद पर भरोसा रखें। सफलता जरूर मिलेगी।

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अशोक ध्यानचंद की नजर पड़ने से बदली जिंदगी
विवेक के जीवन में तब बदलाव आया जब वह 12 वर्ष की उम्र में अकोला में आयोजित एक टूर्नामेंट खेलने गए थे। टूर्नामेंट के दौरान मशहूर हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद की नजर विवेक पर पड़ी। मैदान में ही अशोक ध्यानचंद ने विवेक का नाम पता लिया और फिर अपने पास एकेडमी में बुला लिया। विवेक ने बताया कि कुछ दिनों तक उन्होंने अपने घर में ही ठहराया था। विवेक के पिता रोहित प्रसाद सरकारी प्राइमरी स्कूल गजपुर में शिक्षक हैं। मां कमला देवी गृहिणी और बड़ा भाई विद्या सागर सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। इसके अलावा दो बहनें पूनम और पूजा हैं। पूनम की शादी हो चुकी है और पूजा पढ़ाई कर रही है।

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