बेसहारा बच्चों को दिलाया इन शिक्षकों ने नया मुकाम

बेसहारा बच्चों को दिलाया इन शिक्षकों ने नया मुकाम

Sandeep Nayak | Publish: Sep, 05 2018 02:25:17 PM (IST) Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

25000 निशक्त बच्चों को अपने दम पर दिलाए उपकरण तो किसी ने पटरी पर बैठकर पढ़ाया

होशंगाबाद. व्यवसायिक होती शिक्षा के दौर में आज भी कई ऐसे शिक्षक हैं जो बच्चों को परिवार की तरह सुविधा देकर उनका भविष्य गढ़ रहे हैं। कोई बेसहारा बच्चों के लिए पूरी तरह समर्पित है तो किसी ने निशक्त बच्चों को अपना परिवार माना और ऐसे हजारों बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। अभावों के बीच पले -बढ़ यह बच्चे आज जीवन के अच्छे मुकाम पर हैं।
पटरी पर बैठकर पढ़ाया, आज शिखर पर पहुंच चुके हैं बच्चे
जीवोदय संस्था की सिस्टर क्लारा ने 19 साल पहले रेलवे स्टेशन की पटरियों से करीब 100 बेसहारा बच्चों को शिक्षित करने की शुरूआत की थी। आज उनकी संस्था के कई बच्चे देश की बड़ी कंपनियों में जॉब कर रहे हैं। शुरुआत में सिस्टर क्लारा से कई लोगों ने कहा कि ये बच्चे कभी नहीं सुधर सकते, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे रेलवे मजदूर यूनियन ने उनकी परेशानी को देखते हुए एक कमरा पढ़ाने के लिए दिया। फिर यूके से रीयूनियन टीम ने जीवोदय संस्था दी। संस्था से निकले कई बच्चे दिल्ली, बुधनी, बैंक, होटल मेंनेजमेंट, ब्यूटिशन का काम कर रहे है।
शिक्षक से ज्यादा दोस्त हैं स्पोर्टस टीचर
कन्या शाला स्कूल की खेल शिक्षक बख्तावर खान पिछले 20 साल में कई छात्राओं को नेशलन, राज्य व राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा चुकी हैं। बख्ताबर खान के लिए बच्चे उनका परिवार है। खान बताती है कि स्कूल के ७० बच्चों में से ४० राज्यस्तर, १५ राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वे बच्चों का एक माँ की तरह साथ देती हैं, बच्चों को कपड़े, जूते यहां तक की घर का दाल आटा भी स्वयं दिलाकर देती हैं।
25000 निशक्त बच्चों को माना अपनी संतान
कन्या शाला उमा विद्यालय में पदस्थ शिक्षक विनोद कुमार मुदगल निशक्त बच्चों के लिए समर्पित हैं। यह नि:संतान दम्पत्ति ने पिछले २८ सालों में निशक्त बच्चों को अपनी संतान मानकर उन्हे ना केवल शिक्षित कर रहे हैं बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ भी दिला रहे हैं। वे अब तक 25000 से अधिक निशक्तों के लिए शतप्रतिशत अनुदान पर उपकरण दिला चुके हैं। इन्हे इस काम करने के लिए राज्य एवं राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। विनोद बताते हैं कि 1990 में निशक्त बच्चों के लिए कोई एनजीओ नही होता था, उस उन्होंने इनकी सुविधा के लिए एक बुकलेट स्त्रोत कक्ष मार्गदर्शिता नाम से निकाली थी।

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