यह डॉक्टर हैं कुछ खास, जिन्होंने जीवन बचाया भी संवारा भी

किसी ने विकलांगता दूर करने की ठानी तो कसी ने परिवार बिखरने से बचाया

By: sandeep nayak

Published: 01 Jul 2019, 12:16 PM IST

होशंगाबाद। डॉक्टर अब सिर्फ इलाज तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि वे जीवन बचाने के साथ मरीजों के जीवन को संवारने में भी मददगार साबित हो रहे हैं। किसी ने अस्पताल में सर्जन के तौर पर नौकरी करते हुए एक आलराउंडर डाक्टर की भूमिका निभाई, सिर्फ इसलिए कि मरीज को समय पर इलाज मिले। किसी ने विकलांगता को जड़ से खत्म करने की जिद ठानी और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर दिखाया। शहर के एक वरिष्ठ सर्जन ने अपने चिकित्सकीय ज्ञान से परिवार को बिखरने से बचाया तो एक डाक्टर के लिए बीमार का इलाज पहली प्राथमिकता बन गया है। डाक्टर्स डे पर ऐसे ही चार चिकित्सकों से हम करा रहे हैं आपको रूबरू...!

 

डॉ. सुधीर डेहरिया, सीएस जिला अस्पताल
डा. सुधीर डेहरिया दो साल में 500 से ज्यादा बच्चों को विकलांग होने से बचा चुके हैं। डा. डेहरिया बताते हैं कि जन्म से पैर अंदर की ओर मुड़ा होना। इसे टेलिप्स भी कहा जाता है। अगर इसका इलाज नहीं किया जाता है तो यह दर्दनाक हो सकता है और जब वे बड़े होते हैं तो उनका चलना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि मेरे चिकित्सकीय दौर में संतोषजनक है कि मैंने लोगों को विकलांग होने से बचाया।

 

डॉ. राजेश शर्मा, आर्थोपेडिक
मरीजों का इलाज पहली प्राथमिकता यह कहना है आर्थोपेडिक डा. राजेश शर्मा का। नर्मदा जीवनदायिनी द्वारा अब तक लगभग 2 लाख 75 हजार मरीजों का वे स्वास्थ्य परीक्षण कर चुके हैं, वह भी निशुल्क।

 

डॉ. आर दयाल, सर्जन इटारसी
सरकारी डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी अस्पताल पहले जनसेवा रुग्णालय हुआ करता था। एकमात्र मैं वहां सर्जन था। शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों के लिए आलराउंडर की भूमिका निभानी पड़ती थी। बेहोशी का इंजेक्शन लगाने से लेकर डिलेवरी तक करवाई। उद्देश्य यही था मरीजों को परेशान न होना पड़े। समय पर इलाज हो।



डॉ. बीएम मालवीय, सर्जन
डा. बीएम मालवीय बताते हैं, एक युवक अस्पताल आया। एक सप्ताह पहले उसकी शादी हुई थी। शादी के दो दिन बाद दुल्हन यह कहकर मायके चली गई कि लड़का आदमी में नहीं है। लड़के का पिता उसे अस्पताल लेकर आया। लड़के के जननांग में खराबी थी। हमने सर्जरी की। डेढ़ माह बाद पति-पत्नी अस्पताल आए। युवक के इशारे पर दुल्हन ने मेरे और मेरे सर्जन बेटे श्रवण के पैर छुये। परिवार बिखरने से बच गया था।

sandeep nayak Desk/Reporting
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