आदिवासी तस्करी और टोने-टोटके में करते है इन वन्य प्राणियों का इस्तेमाल

आदिवासी तस्करी और टोने-टोटके में करते है इन वन्य प्राणियों का इस्तेमाल

poonam soni | Publish: Sep, 04 2018 12:42:26 PM (IST) Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

तस्करी और टोने-टोटके के कारण विलुप्त हो रहीं प्रजातियां

होशंगाबाद. सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से कई वन्य प्राणियों की प्रजातियां लगातार विलुप्त हो रहीं है। इसका कारण लगातार इनका शिकार और तस्करी होना है। दरअसल शिकार करने के बाद इनको बेच दिया जाता है। जिनका उपयोग दवा बनाने और टोने-टोटके करने में किया जाता है। एसटीआर की पहचान कही जाने वाली उडऩ गिलहरी और बड़ी गिलहरी की संख्या भी लगातार कम हो रही है। इसका कारण जंगलों की संख्या कम होना है। गर्वमेंट पीजी कॉलेज के प्रिसिंपल डॉ. कुवर वजाहत शाह बताते हैं कि टोटकों या फिर देशी दवा बनाने के लिए इनका शिकार किया जाता है। इन दवाओं का उपयोग निमोनिया, बबासीर, दांत साफ करने, बच्चों की बीमारी दूर करने जैसे कामों के लिए किया जाता है। डॉ. शाह बताते हैं कि आदिवासी क्षेत्र बैतूल, होशंगाबाद, सोहागपुर, रायसेन जिले के साड़ेबारह गांव, पचमढ़ी के आदिवासी सबसे अधिक दवा के रूप कर रहे हैं। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में 300 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां, 44 स्तनपायी, 31सरीसृप एवं 500 से अधिक कीट प्रजातियां पाई जाती हैं। होशंगाबाद के इस एसटीआर की पहचान हंै यहां पाई जाने वाली उडऩ गिलहरी और बड़ी गिलहरी। जो केवल होशंगाबाद के एसटीआर में ही पाई जाती हैं। लेकिन कम हो रहे जंगल के कारण अब इनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है।

जंगल कम होने से सतपुड़ा की पहचान पर खतरा
वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. गुरूदत्त शर्मा ने बताया कि सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में सबसे अधिक उडऩ गिलहेरी और बड़ी गिलहरी पाई जाती हैं, जिसकी प्रजाती केवल अपने यहां पाई जाती है इसलिए यह सतपुड़ा की पहचान भी हैं। लोग इसे देखने के लिए जंगल में पहुंचते हैं। जो केवल वृक्षों में रहती है।
1. अभी तो कान्हा से लाए बारहसिंघा के लिए इंतजाम किए हैं। बारहसिंघा की हीयरिंग हो रही है। साथ ही कान्हा में प्रोपोगेट कर रहे हैं, इसी तरह बीमार जानवरों को स्पेशल ट्रीटमेंट की बात आती है तो उस पर वर्क होता है। टाइगर भी बांधवगढ़, कान्हा से लाए व जाए गए थे। ट्रांसफर करने से स्किन और बीमारी का खतरा कम होता है।
एसके सिंह, एसटीआर वन संरक्षक

इन तरह होता है दवाओं में इस्तेमाल
बड़ी गिलहेरी, काला खरगोश- यह वृक्षों में रहती है, जगलों की कटाई के कारण इसकी संख्या कम हो रही है।
पैंगोलीन- इसकी अंगूठी बनाकर बाबासीर के मरीज को पहनाते है।
मोर- इसके पेट से किजर्ड आर्गन की स्किीन निकालकर बच्चों को पिलाते हैं। ताकि उनकी बामारी दूर हो सके।
बारह सिंघा- इसके सीगों का उपयोग बच्चों के पसलियों में इस्तेमाल करते हैं।
बीर बहोटी- गोकल गैया सुखाकर निमोनिया के मरीज को दिया जाता है।
सांभर सींग- इसके सींग को पीसकर मंजन बनाकर दांत साफ करने में उपयोग किया जाता है।
शेर- इसका शिकार करने के बाद चमड़ा, पंजे के नाखून के ताबीज बनाए जाते हैं। जो नजर लगने, डरावने सपने, लकी बोन से बरकत के लिए दिए जाते हैं।
शेर के मूंछ के बाल - इनका उपयोग टोटके करने में किया जाता है।
शेर की चर्बी, हड्डीयां - इसका उपयोग लोगों के लिए मर्दानगी की दवा के रूप में किया जाता है।
ये वन्यप्राणी भी हैं : सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बाघ के अलावा अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां तेंदुआ, साम्भर, जंगली कुत्ता, पैगोलिन, पाईथन, चितल, भालू, गौर, अजगर, उडन गिलहरी, जंगली बिल्ली, टोनी कुत्ता, मालाबारी बड़ी गिलहरी एवं मगरमच्छ है। यहां 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां, 44 स्तनपायी, 31 सरीसृप एवं 500 से अधिक कीट प्रजातियां पाई जाती हैं।

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