गौरैया की जगह घरों में फुदक रहीं बुलबुल, खपरैल छतें नहीं होने से हुई गायब

शहर से 5-10 किमी दूर के गांवों में दिख रही गौरैया

होशंगाबाद। जब चिडिय़ा की चहचहाहट से सुबह होती थी। एक समय था जब हमारी सुबह चिडिय़ों (गौरैया) की चहचहाहट सुनने के साथ होती थी। लेकिन शहरों में लगातार बन रही पक्की छतों के कारण ना तो यह दिखाई देती हैं ना ही इनकी आवाज सुनाई देती है। हालाकि शहर से 5 से 10 किमी दूर ग्रामीण क्षेत्रों में यह अब भी दिखाई देती हैं। शहर के पर्यावरण विद् आर.आर सोनी का कहना है कि गौरैया कम नहीं हुई है, बल्कि वह शहरों से गांवों की ओर स्थानांतरित हो गई है, क्योंकि उन्हें शहरी परिवेश में न तो भोजन मिल रहा है और न रहने के लिए घोंसले की व्यवस्था हो पा रही है। पक्षी विशेषज्ञ रवि उपाध्याय ने कहा कच्चे और खपरैल घरों की जगह अब कांक्रीट की छतों ने ले ली है। बताया जाता है कि गौरैया नहीं होने से 80 फीसदी तक कीटों का इन्फेक्शन बढ़ा है।

विदेशी बुलबुल ने ली जगह
रवि उपाध्याय का कहना है कि गौरैया की जगह अब विदेशी बुलबुल ने ले ली है। जो काली रंग की और पूछ की तरफ लाल रंग की होती है। यह चावल, फल, रोटी खाती है इसलिए यह आसानी से स्वयं को इस माहौल में ढाल लेती है वहीं गौरैया गर्म जगह पर नहीं रह सकती। इसलिए बबूल, फाइकस के पेड़ पर घोसला बना रही है।

आर्टिफिशियल नेस्टिंग करें
पक्षी विशेषज्ञ रवि उपाध्याय का कहना है कि शहर के लोग आर्टिफिशियल नेस्टिंग (घोंसला) कर गौरैया को अपने आंगन में बुला सकते हैं। घर बनाते समय पक्षियों के घोंसले के लिए व्यवस्था जरूर करें। पक्षी विशेषज्ञ जगत फ्लोरा बताते हैं कि शहर में जो घर कच्चे बने हैं या जिन लोगों ने आर्टिफिशियल घोंसले बनाए हैं, वहां गौरैया अब भी आती हैं।

अब हम यह करें...
इस विश्व गौरैया दिवस आप संकल्प करें कि अपने घरों में आर्टिफिशियल नेस्टिंग करें या गौरैया के लिए भोजन की व्यवस्था करें तो वह दिन दूर नहीं जब शहर में गौरैया की चहचहाहट लौट आएगी।

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poonam soni
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