यहां राम नहीं रावण है इनके आराध्य, इस शहर में दशहरें पर रावण का पुतला नहीं जलता

यहां राम नहीं रावण है इनके आराध्य, इस शहर में दशहरें पर रावण का पुतला नहीं जलता
यहां राम नहीं रावण है इनके आराध्य, इस शहर में दशहरें पर रावण का पुतला नहीं जलता

poonam soni | Updated: 06 Oct 2019, 03:58:55 PM (IST) Hoshangabad, Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

हर साल दशहरें पर अपने इष्ट देव राजा रावण की पूजा करता है आदिवासी समाज

बैतूल/ मध्यप्रदेश के बैतूल जिले से 60 किमी और सारनी से 20 किमी दूर छतरपुर होशंगाबाद संभाग का ऐसा गांव है जहां रावण का मंदिर है। और आदिवासी समाज हर साल यहां दशहरे पर अपने इष्ट देव राजा रावण की पूजा करता है। सबसे खास बात की यहां दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलता है। न ही आदिवासी समाज राम का विरोध करता है। लेकिन इन दिनों यह गांव एक नई प्रकार की मांग को लेकर सुर्खियों में है। आदिवासी अंचल के इस गांव में आदिवासी परंपरा के अनुसार भीलटदेव, बारंग देव, मुठिया देव और राउण देव को पूजा जाता है। लेकिन इस बार चर्चा में रावण देव है। आदिवासियों का मानना है। यह रावण देव वही देव है जिसे हिंदू समाज रावण के रूप में जानता है। ग्रामीण कहते हैं हम रावण के वंशज तो नहीं लेकिन वे हमारे कुलदेवता हैं। गांव में टेकरी पर मंदिर है और हर त्योहार पर रावण देव की पूजा होती है। हालांकि इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं है।


रावण के पुतले के दहन का विरोध
जानकारी के अनुसार आदिवासी समुदाय के लोग आराध्य मानते हैं। और वह अपने इष्ट देव रावण के पुतला दहन का विरोध जता रहा है। आदिवासी समुदाय यही मांग सदियों से रावण के पुतले का दहन करते आ रहे हिंदू समाज को आश्चर्य में डाल रही है। हालांकि आदिवासी समाज की मांग सिर्फ इतनी है की उनके इष्ट और कुलदेव राजा रावण को बुराई का प्रतीक बताकर उनकी भावनाओं को हर वर्ष आहत न किया जाए। समुदाय के लोगो का कहना है कि उसी तरह उनके इष्ट देव का पुतला जलाकर हर साल उनकी भावनाओं का अनादर नहीं किया जाए।

यहां लगता है मेला
बैतूल जिले के सारनी नगर की ग्राम पंचायत छतरपुर से सटे गांवों में आदिवासी लोग निवास करते हैं। इन गांवों में रहने वाले आदिवासी समाज के लोग रावणदेव की पूजा करते हैं। इन आदिवासियों की ऐसी मान्यता है कि रावण ही इनके देवता है और इनकी पूजा अर्चना करने से ही इनके गांव में खुशहाली बनी रहती है। बताया जाता है कि जब गेहूं की नई फसल पक कर तैयार हो जाती है तो सबसे पहले रावणदेव की पूजा अर्चना कर उन्हें अर्पित की जाती है। इस अवसर पर यहां पर आदिवासियों द्वारा चार दिवसीय मेला का आयोजन भी किया जाता है। जिसमें सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग एकत्रित होते हैं और रावण देव की पूजा करते है। मेले में आदिवासियों द्वारा नृत्य और प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं।


पहाड़ी पर बना है रावणदेव का मंदिर
2 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर रावणदेव का मंदिर है। उन्होंने बताया कि जो हम आदिवासियों का तीर्थ स्थल है। इस पहाड़ी पर चार दिवसीय मेले का आयोजन किया गया है। उन्होंने बताया कि आदिवासी ग्रामीण यहां अपने-अपने देवों को लेकर पहुंचेंगे। पूजन, अभिषेक करेंगे। नई फसल चढ़ाकर मन्नतें मांगेंगे।

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