Coronavirus : सेहत पर पड़ रहा खराब असर, मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी

Highlights

-हर रोज़ सैकड़ों की संख्या में मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं

-कोरोना वायरस इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ना स्वाभाविक है

- विशेषज्ञों ने भी भविष्य को लेकर इस संबंध में चेतावनी दी है

By: Ruchi Sharma

Published: 18 Apr 2020, 12:06 PM IST

नई दिल्ली.पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से जूझ रही है। हर रोज़ सैकड़ों की संख्या में मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना वायरस इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ना स्वाभाविक है। लोगों को परेशान करने वालीं तीन वजहें हैं। एक तो कोरोना वायरस से संक्रमित होने का डर, दूसरा नौकरी और कारोबार लेकर अनिश्चितता और तीसरा लॉकडाउन के कारण आया अकेलापन। विशेषज्ञों ने भी भविष्य को लेकर इस संबंध में चेतावनी दी है। उनका कहना है कि इस त्रासदी से दुनियाभर के लोगों की मानसिक सेहत पर खराब असर पड़ सकता है। ऐसा होने पर इसका प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।

मानसिक स्थिति पर न पड़े असर, उठाने चाहिए कदम

दरअसल, न्यूराेसाइंटिस्ट, मनाेचिकित्सक और मनाेवैज्ञानिकों का कहना है कि लाेगाें की मानसिक स्थिति पर काेई असर न पड़े, इसके लिए कदम उठाए जाने चाहिए। सभी देशों को इस दिशा में लक्षण आधारित इलाज और रिसर्च को बढ़ावा देना शुरू कर देना चाहिए। मानसिक विकार से जुड़े ऐसे मामलों की दुनियाभर में एक साथ निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए।

अनदेखी से आगे समस्या और विकराल हो सकती है

इस संबंध में ग्लास्गो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोरी ओकॉनर का कहना है कि शराब, नशे की लत, जुआ, साइबर बुलिंग, रिश्ते टूटना, बेघर होने की वजह से चिंता और डिप्रेशन से असामान्य व्यवहार जैसे लक्षणों वाले लोगों की अनदेखी से आगे समस्या और विकराल हो सकती है।

तकनीकों को इस्तेमाल करने की जरूरत

ऐसी समस्याओं को नजरअंदाज करने से न केवल लोगों का जीवन, बल्कि समाज भी प्रभावित हुए बैगर नहीं रहेगा। ऐसे लोगों पर नजर रखने की जरूरत है, जो गंभीर रूप से डिप्रेशन में हैं, या उनमें आत्मघाती कदम उठाने के विचार आते हैं। इनकी निगरानी के लिए मोबाइल फोन से जुड़ी नई तकनीकों को इस्तेमाल करने की जरूरत है।

देश में बढ़ी मानसिक पीड़ितों की संख्या

इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के एक अध्ययन के अनुसार, कोरोना वायरस के आने के बाद देश में मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है। दुनियाभर में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में केवल 1 प्रतिशत हेल्थ वर्कर्स ही मानसिक स्वास्थ्य के उपचार देने संबंधी व्यवस्थाओं से जुड़े हैं। भारत में इसका आंकड़ा और भी कम है।

Ruchi Sharma
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