चिकन खाने के तगड़े शौकीन लोगों के लिए बुरी खबर, ऐसे हो रहा है आपकी सेहत को नुकसान

  • मुर्गी फॉर्म में एंटीबायोटिक का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है
  • एंटीबायोटिक की मदद से मुर्गियों का तेजी से विकास होता है
  • यहीं एंटीबायोटिक चिकन मीट के जरिए इंसान के शरीर में पहुंचते है

By: Piyush Jayjan

Updated: 03 Dec 2019, 01:31 PM IST

अगर आप नान वेज खाने के शौकीन है तो जाने अंजाने में खुद अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दरअसल फूड एनिमल के जरिये मानव शरीर में गैर जरूरी एंटीबायोटिक बेवजह पहुंच रहा है। जैसे कि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल मुर्गियों को बीमारी से बचाने के लिए किया जाता है।

मुर्गी फॉर्म में कई एंटीबायोटिक का यूज इसलिए भी किया जाता है ताकि इनका तेजी से विकास हो सकें। ये इंजेक्शन और दानों में मिलाकर खिलाने की फॉर्म में होता है। जिसके बाद चिकन मीट के जरिए ये एंटीबायोटिक्स खानेवालों के शरीर में पहुंचते हैं।

जबकि हमारे शरीर को फालतू में इनकी जरूरत नहीं होती है। एंटीबायोटिक्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले पांच देशों में भारत पहले नंबर पर काबिज है। आमतौर पर मुर्गे/मुर्गियों को ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, क्लोर टेट्रासाइक्लिन, नियोमाइसिन, एमिनोग्लाइकोसाइड भारी मात्रा में दिए जाते है।

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डब्ल्यूएचओ ने इन सभी को इंसान के लिए खतरनाक श्रेणी में शामिल किया हुआ है। मुर्गियों को बीमारियों से बचाने और उनका वजन बढ़ाने के लिए जो एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं, उनकी वजह से मानव शरीर पर दवाइयों का असर भी नहीं होता है।

सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वाइरनमेंट (सीईसी) ने अपनी स्टडी में कहा है कि ऐंटीबायॉटिक्स बीमारी होने पर दिए जाते हैं, न कि रोग से बचाव और किसी तरह की ग्रोथ के लिए। फालतू दवाएं देने से न सिर्फ मुर्गे/मुर्गियों पर दुष्प्रभाव होगा बल्कि उसे खाने इंसान के शरीर में भी ये दवाएं बिना ज़रुरत पहुंचेंगी।

सीईसी की फरवरी 2018 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पोल्ट्री और मीट के फॉमर्स में हर साल करीब 2700 टन एंटीबायोटिक्स खिलाए जा रहे हैं। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका (US) में हर साल करीब 15-17 मिलियन पाउंड्स एंटीबायोटिक्स खिलाए जाते हैं।

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एक इंवेस्टिगेटिव वेबसाइट में छपी रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि मुर्गियों को बीमारियों से बचाने के लिए कोलिस्टी नाम का एंटीबायोटिक दिया जाता है। वहीं कोलिस्टीन का इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार लोगों पर करना चाहिए. किसी भी अन्य परिस्थिति में ये पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक है।

टेट्रासाइक्लिन और फ्लूरोक्विनोलोंस एंटीबायोटिक्स कॉलेरा, मलेरिया, रेस्पायरेटरी और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शंस के इलाज में इस्तेमाल किए जाते हैं। जानवरों पर इनके इस्तेमाल से परिणाम ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के रूप में सामने आते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इसके प्रभाव से हर साल लगभग 57000 नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है। क्योंकि इन खतरनाक एंटीबायोटिक्स का असर मां के ज़रिए बच्चे पर भी पड़ता है। जिसके बच्चों पर गंभीर परिणाम होते है।

Piyush Jayjan
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