काजू की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे बीदर जिले के किसान

काजू की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे बीदर जिले के किसान

Zakir Pattankudi | Updated: 23 Jul 2019, 08:04:34 PM (IST) Hubli, Dharwad, Karnataka, India

काजू की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे बीदर जिले के किसान
-पांच सौ एकड़ भूमि पर हो रही खेती
-20 साल तक प्राप्त कर सकते हैं लाभ

हुब्बल्ली

काजू की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे बीदर जिले के किसान
हुब्बल्ली
बीदर जिले के किसान काजू की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस खेती के प्रति किसानों के आकर्षण का यह हाल है कि काजू की खेती का क्षेत्र बढ़ते हुए लगभग 500 एकड़ तक विस्तारित हो चुका है।
बीदर तालुक के कमठाणा, अतिवाळ, चिट्टा, होन्नीकेरी और कंगनकोट गांवों में, हुमनाबाद तालुक के चिटगुप्पा, निर्णा, मुत्तंगि और गडवंती गाँवों में तथा बसवकल्याण तालुक के हळ्ळी गाँव के किसान काजू की खेती करते हुए अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर रहे हैं।

पांच एकड़ में उगाया काजू

सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी नागनाथराव निडोदा ने बीदर तालुक के कमठाणा गांव की पांच एकड़ जमीन में विशेष रुचि लेकर काजू उगाया है। उन्होंने वर्ष 2010 में गोवा से लाए गए काजू के पौधों की वी-4 और और वी-7 किस्मों को खरीदा। 5 एकड़ भूमि में लाइन से लाइन 20 फीट और पौधे से पौधे 20 फीट के रूप में 10 हजार रु. की लागत से कुल 540 पौधे लगाए। हर साल चार ट्रैक्टर मल्च और ड्रिप सिंचाई से दो दिन में एक बार पानी पिलाते हैं। फूलों के दौरान पौधों को औषधीय कीटनाशक छिड़का जाता है। इससे ये पौधे बहुतायत में उगते हैं और हरे-भरे हरियाली के साथ दिखने लगे हैं।

20 साल तक प्राप्त कर सकते हैं लाभ

काजू के पौधे लगाने के चार साल बाद 2014 में पांच क्विंटल काजू की पैदावार मिली। हुबली के विक्रेताओं ने इसे 10 हजार रुपए प्रति क्विंटल में खरीदा। हर साल पैदावार बढ़ रही है, पिछले साल 20 क्विंटल की उपज के साथ 3-4 लाख रु. की कमाई की है। रखरखाव की लागत प्रति वर्ष केवल 10-15 हजार है। रोपण के बाद 20 साल तक आप लगातार लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

हुबली व स्थानीय विक्रेता खरीददते हैं

हुबली और स्थानीय फल विक्रेता इनके ही बगीचे में आकर काजू, आम और केले खरीदते हैं। अब बीदर में भी काजू का बाजार है और उनके द्वारा उगने वाले गुणवत्ता वाले काजू की उच्च मांग है। प्रति क्विंटल 14 हजार से 15 हजार रु. दर से काजू की बिक्री होती है।

बोरवेल की ड्रिल की

प्रगति कृष्णा ग्रामीण बैंक से 2016 में सेवानिवृत्त हुए 61 वर्षीय नागनाथराव जो मूल औराद (बी) तालुक के निडोदा गांव के हैं। कृषि को अधिक लाभदायक बनाने के लिए कमठाणा और याकतपुर गाँवों के कुल 12 एकड़ जमीन को सिंचाई अंतर्गत लाने के लिए बोरवेल ड्रिल की गईं।

वर्मी कम्पोस्ट खाद इकाई बनाने की योजना

वर्षा का पानी संग्रहण के लिए दोनों खेतों में फार्म पॉण्ड बनाने के लिए 1.35 लाख सब्सिडी और बागवानी विभाग ने ड्रिप सिंचाई के लिए 90 प्रतिशत सब्सिडी और राष्ट्रीय बागवानी मिशन परियोजना के तहत 2.50 एकड़ जमीन पर जी -9 केला उगाया । इसलिए प्रति एकड़ 45,000 रुपये सब्सिडी प्राप्त किया। ट्रैक्टर और अन्य मशीनरी के उपयोग से अब बागवानी का काम आसान हो गया है। आम, केला और सब्जी फसलों की कटाई, ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए एक पैकहाउस और वर्मी कम्पोस्ट खाद इकाई बनाने की योजना बनाई है।

खुद फसल बेचने से अधिक लाभ

दोनों बागानों के रखरखाव पर प्रतिवर्ष 1.5 से 2 लाख रुपए और 5-6 लाख रुपए की आय होती है। जैसे-जैसे काजू के पौधे बड़े होते हैं, आय भी बढ़ सकती है। इससे पहले, पारंपरिक फसलों को उगाने से ज्यादा आमदनी नहीं होती थी। बागवानी का सपना बागवानी विभाग के सभी अधिकारियों की सलाह और मार्गदर्शन से सन्निहित हुआ है। किसानों को एकीकृत खेती, बहु-फसल और ड्रिप सिंचाई पद्धति को अपनाना चाहिए। खुद फसल को बेचने से अधिक पैसा कमाया जा सकता है।
-नागनाथराव निडोदा, सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी

अधिकारी कहिन

एक दिलचस्प की बात है कि भालकी तालुक के माळचापुर गाँव के किसान 100 एकड़ में काजू की खेती में लगे हुए हैं। लाल मिट्टी काजू की खेती के लिए अधिक उपयुक्त है।
-मल्लिकार्जुन बावगे, उप निर्देशक, बागवानी विभाग, बीदर

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