दान का फल वस्तु पर नहीं वृत्ति पर होता है आधारित

दान का फल वस्तु पर नहीं वृत्ति पर होता है आधारित

By: S F Munshi

Published: 13 Sep 2021, 11:35 PM IST

दान का फल वस्तु पर नहीं वृत्ति पर होता है आधारित
-आचार्य श्रीमद्विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा
विजयपुर
जैन संघ विजयपुर के पाश्र्व भवन में जैनाचार्य श्रीमद्विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने आयोजित धर्मसभा में कहा कि दान का फल वस्तु पर नहीं, वृत्ति पर आधारित हैं। कुत्ता, गधा, गाय और जमीन मानव से कम लेते हैं और ज्यादा देते हैं। धनवाले सभी लक्ष्मीपति नहीं होते हैं। अधिकांश तो लक्ष्मीदास या लक्ष्मीनंदन ही होते हैं।
उन्होंने कहा कि पैसा आने पर अभिमान पैदा होता है और जाने पर व्यक्ति दीन बनता है। जल देने वाले बादल का स्थान ऊपर है और संग्रह करने वाले सागर का स्थान नीचे है। दानी का हाथ हमेशा ऊपर रहता है। दान देने के पहले उत्साह, दान देते समय आनन्द और दान देने के बाद अनुमोदना हो तो दान का फल कई गुणा बढ़ जाता है। धान्य (अनाज) को पचाना आसान है लेकिन धन को पचाना मुश्किल है। जो धन पास में होगा वह मरने के बाद साथ में नहीं जाएगा, किन्तु जो दान में दिया होगा, वह साथ में आएगा। जो गरीबों की दुआ लेता है, उसे डॉक्टरों की दवाई लेनी नहीं पड़ती है। पैसा आने पर दो चीजें गायब हो जाती हैं- सच्ची नींद और सच्ची भूख। पैसा आने पर दो चीजें सामने से आती हैं -झूठी चिंताएं और झूठे संबंध। मधुमक्खी, चींटी और कृपण को खुद की कमाई काम नहीं लगती है। सुकृत को जितना छिपाओगे, वह शक्तिशाली बनेगा और दुष्कृत को जितना प्रगट करोगे, उतना वह कमजोर बनेगा। सुगन्ध रहित पुष्प तथा दान रहित लक्ष्मी बेकार है।

S F Munshi Reporting
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