कोरोना की दूसरी लहर तोड़ रही वस्त्रोद्योग की कमर

कोरोना की दूसरी लहर तोड़ रही वस्त्रोद्योग की कमर

By: S F Munshi

Published: 09 Apr 2021, 08:38 PM IST

कोरोना की दूसरी लहर तोड़ रही वस्त्रोद्योग की कमर
-पहले सूत की बढ़ी दर से पैदा हुआ था आर्थिक संकट
कोल्हापुर
कोरोना की दूसरी लहर वस्त्रोद्योग की कमर तोडऩे लगी है। इससे पहले छह माह से सूत की दर बढऩे से वस्त्रोद्योग में अस्वस्थता चल रही है। अब सूत की दर कम होने के चलते नई चिंता बढ़ गई है। कपड़े की दर कम होकर मांग पर असर हो रहा है। कोरोना का संकट बढऩे के कारण कच्चा माल मिलना, उत्पादन, साठा करना, बिक्री, आर्थिक समस्या ऐसे कई कारणों से वस्त्रोद्योग क्षेत्र फिर से अनिश्चितता में फंसा हुआ है।
वस्त्रोद्योग का आर्थिक हंगाम दिवाली पडवा से शुरू होता है। उस समय सूत के दर में बढोतरी होने लगी। दिसंबर तक उसमें दस फीसदी बढोतरी हुई जबकि आगे मार्च तक वह 25 से 30 फीसदी बढ़ा। सूत के बढ़ते दाम देखते हुए सूत की खरीदारी करना पावरलूमधारकों के बस में नहीं था। 1996-98 को सूत की दर में बढोतरी हुई। उससे देशव्यापी आंदोलन हुआ जबकि इस साल की बढोतरी उससे भी ज्यादा थी। ऐसे में देश के कई पावरलूम केंद्रों में उत्पादन बंद रखने का फैसला लिया गया। सूत की दर आसमान को छू रही थी और कपड़े की बिक्री कम होने के चलते पावरलूमधारकों को आर्थिक नुकसान सहना पडा। कपास के दर में बढोतरी होने का कारण सूत दर बढ़ रही है ऐसा कारण व्यापारी दे रहे थे। लेकिन कुछ पावरलूमधारकों का कहना था कि यह कृत्रिम दरवाढ है। इससे व्यापारी नफाखोरी कर रहे हैं। यह बात पावरलूमधारकों के संगठनों ने स्पष्ट की उस समय उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने बैठक लेकर इसकी जांच के आदेश दिए।
मार्च के बाद बदलाव
आर्थिक साल खत्म होने के बाद वस्त्रोद्योग की स्थिति में बड़ा बदलाव हुआ। कपास की बढ़ती दर पर लगाम बैठा। 47 हजार रुपए प्रतिखंडी होनेवाला अच्छे दर्जे का कपास 45 हजार रुपए प्रतिखंडी इतना कम हुआ। इसका असर सूत पर दिखने लगा। सूत की दरवाढ को 6 माह में पहली बार ब्रेक लगा। 32, 43 काउंट का अच्छे दर्जे का सूत 1350 रुपए था जो गए आठ दिनों में 1275 रुपए इतना कम हुआ है। दूसरे प्रकार के सूत में कमी हो रही है। सूत की दर कम हो रही इसका कारण कपड़े की दर में कमी बताई जा रही है। दूसरी ओर मांग में कमी हुई है। देश के बड़े बाजारों में कोरोना का संकट मंडरा रहा है। वहां से होने वाली कपास की मांग कम हो रही है। स्थानीय बाजारपेठ, विकेंद्रित क्षेत्र का पावरलूम व्यवसाय पर उसका असर हो रहा है। बड़े पैमाने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई है। एक घटक की ओर से दूसरी घटक की ओर माल की खरीदारी के पैसे हस्तांतरण होने में देर हो रही है। दूसरी ओर कोरोना का संकट बढऩे से भिवंडी, मालेगाव, नागपुर, इचलकरंजी और सांगली में बसे परप्रांतीय कामगार अपने-अपने घर वापस जा रहे हैं जिसका असर निर्मिति पर हो रहा है।

S F Munshi Reporting
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