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श्रावक के दिल में होती है संयम ग्रहण करने की अभिलाषा

श्रावक के दिल में होती है संयम ग्रहण करने की अभिलाषा

हुबली

Published: December 02, 2021 10:58:16 pm

श्रावक के दिल में होती है संयम ग्रहण करने की अभिलाषा
-धर्मसभा में जैनाचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा
विजयपुर
जैन संघ विजयपुर के पाश्र्व भवन में जैनाचार्य श्रीमद्विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने गुरुवार को आयोजित धर्मसभा में कहा कि श्रावक अर्थात् संयम का अभिलाषी। जिस प्रकार एक गरीब व्यक्ति के दिल में भी अमीर बनने की तीव्र अभिलाषा होती है, उसी प्रकार जिसने जैन धर्म को प्राप्त किया है, ऐसे श्रावक के दिल में भी सतत संयम ग्रहण करने की अभिलाषा रही होती है।
उन्होंने कहा कि सच्चे श्रावक को संसार की धन-संपत्ति, वैभव, प्रतिष्ठा, पुत्र-परिवार आदि सभी बंधनरूप लगते हैं, वह उनसे पूर्ण छुटकारा चाहता है और इसीलिए वह ऐसे मनोरथ रखता है कि वह दिन कब आएगा कि मैं संसार के संग का त्याग कर नि:संग बन जाऊंगा।
आचार्य ने कहा कि पेट भरने के लिए जो भोजन तैयार किया जाता है, उसमें छहकाय के जीवों की विराधना रही हुई है। छहकाय की हिंसा, पाप से मेरी आत्मा भारी बनती जा रही है। अत: मेरे जीवन में वह दिन कब आएगा कि जब मैं भागवती दीक्षा अंगीकार कर माधुकरी वृत्ति से निर्दोष भिक्षा द्वारा अपना जीवन निर्वाह करूंगा अर्थात् अपने जीवन-निर्वाह के लिए मैं किसी भी जीव की हिंसा में निमित्त नहीं बनूंगा। आत्मा के विकास-क्रम में सर्वप्रथम आत्मा में विरक्ति भाव पैदा होगा, उसके बाद विरक्ति आएगी। विरक्ति के अभाव में किया गया त्याग मी वास्तविक त्याग नहीं है। जैनशासन में विरक्ति पूर्वक के त्याग की ही महिमा गाई गई है।
संयम का करें पालन
जैनाचार्य ने धर्मसभा में कहा कि मानव को प्राप्त इन्द्रियाँ स्वभाव से चंचल हैं और दुष्प्रवृत्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहती हैं।
उन्होंने कहा कि संयम और संवर का घनिष्ठ सम्बंध है। जहाँ संयम है, वहाँ संवर रहेगा ही। यह संयम विषय-कषायरहित अवस्था है। संयम द्वारा कषायों का उपशमन व क्षय किया जाता है। अत: संवर की साधना के लिए संयम को भजना ही श्रेयस्कर है। इन विषय और कषायों का जय ही संयम की वास्तविक साधना है। जब तक विषयों का राग और कषायों की आग जीवित रहेगी तब तक संयम की साधना का आस्वादन नहीं हो सकेगा।
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