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हुबली

आज का युवा बन रहा बदलाव का वाहक, महिलाएं भी आ रही आगे, दे रहे वोलंटियर के रूप में सेवाएं

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3 months ago
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कहते हैं यदि किसी चीज को बदलना है तो शुरुआत खुद से करनी होती है। इसके लिए वोलंटियर के रूप में सेवाएं देना बेहतर माध्यम हो सकता है। हम सब स्वार्थरहित होकर आगे आएं और मिलकर हाथ बढ़ाएं। हम लोगों से जुड़ें। उन्हें समझें। ऐसे में हम बदलाव के वाहक भी बन सकते हैं। स्वयंसेवा करते जाएंगे तो हम पाएंगे कि हमारी जिन्दगी में कई मूल्य, गुण शामिल हो रहे हैं। इससे व्यक्तित्व में एक बड़ा बदलाव आता है। नजरिया बदल जाता है। एक वालंटियर का निश्चित कार्य नहीं होता है, वह आवश्यकता के अनुसार सेवा प्रदान कर सकता है। गरीबो की मदद करना, चिकित्सा सेवा पहुंचाना, लोगों को खतरे से बाहर निकालना, जरूरतमन्दो तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचाना तथा देशहित में कार्य करना भी वोलंटियर सेवा ही है। वालंटियर उन्हें कहा जाता है जो बिना किसी स्वार्थ के लोगों की सेवा करते हैं। यह किसी संस्थान से जुड़े हो सकते हैं। उस व्यक्ति को भी वालंटियर कहा जा सकता है जो अकेला ही लोगों की सेवा के लिए उपस्थित रहता है। यह निशुल्क रूप से कार्य करते हैं। कोरोना काल के समय कई युवाओं ने जब वोलंटियर के रूप में सेवाएं दीं तो लगा वास्तव में किसी की सही मायने में मदद हो रही है। कोविड काल के दौरान बहुतों को स्वयंसेवा को नजदीक से जानने-समझने का अवसर मिला। हम लोग अपनी इच्छा से जरूरतमंद बुजुर्गों की सेहत खराब होने पर ध्यान रख सकते हैं या अकेलापन दूर करने के लिए बुजुर्गों के साथ वक्त बिता रहे हैं। युवा बड़ी संख्या में जुड़ रहे हैं। इनका मानना है कि ढलती उम्र में उन्हें भी सहारे की जरूरत होगी। इस अवसर पर मिलते हैं कुछ ऐसे युवक-युवतियों से जो समाज में बदलाव के लिए स्वयंसेवा की मशाल थामे हुए हैं।

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हुब्बल्ली में निवास कर रही कॉलेज छात्रा निधि जैन (Nidhi Jain) कहती है, मैंने अपने जन्मदिन पर वृद्धाश्रम में जाकर बुजुर्गों को खाना खिलाया और उनकी सेवा की। कुछ पल उनके साथ बिताए। ये यादें जेहन में आज भी ताजा है। कई बार अपने परिवार के साथ सरकारी स्कूलों में जाकर जरूरतमन्द बच्चों को स्टेशनरी का वितरण किया। इससे बहुत सुकून भी मिलता है। मैं वोलंटियर के रूप में सेवाएं देकर खुशी का अनुभव करती हूं। मदद के लिए हाथ बंटाना मेरे स्वभाव का हिस्सा रहा है। मैं समय-समय पर ऐसी जगहों पर जाकर सेवा कार्य में हाथ बंटाती हूं जहां लोगों को जरूरत होती है। चाहे वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की सेवा हो या फिर दिव्यांगो की मदद करना। सदैव यही प्रयास रहता है कि किसी तरह जरूरतमन्द लोगों को मदद मिल जाएं। इन बच्चों के लिए पुस्तकें, स्टेशनरी, मिठाई, बिस्किट्स, चाकलेट्स देकर उनकी जरूरतें पूरी की जाती है। इसके बाद इनके चेहरे पर जो खुशी होती है वह देखने लायक हो जाती है। कई बार तो उससे सचमुच में आंखें नम हो जाती है। ईश्वर ने यदि हमें कुछ मदद के लिए दिया हैं तो निश्चय ही हमें दूसरों की मदद के लिए अपने हाथ सदैव खुले रखने चाहिए।

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हुब्बल्ली में निवास कर रही कॉलेज छात्रा याशिका जैन (Yashika Jain) कहती हैं, मुझे जब भी समय मिलता है लोगों की मदद करने के लिए आगे आती हूं। गरीब बच्चों को भी उनकी पढ़ाई में जितना हो सका, उनकी मदद की है। इस तरह की सेवा के माध्यम से मन को जो संतुष्टि मिलती है, उसे हम शब्दों में बयां नहीं कर सकते हैं। इन बच्चों की खुशी भी देखते ही बनती है। स्वयंसेवा खुद में परिवर्तन लाने का बड़ा काम है। हमें समझ में आता है कि समाज के भीतर रहते हुए किस तरह के बदलाव की जरूरत है। कोविड में कई लोगों ने जरूरतमन्दों की मदद की। इंसानियत सबमें हैं। बस हम दर्शाने में संकोच कर देते हैं। स्वयंसेवा से जुड़ेगें तो निश्चित ही मन के भीतर छिपी इंसानियत उभर कर बाहर आ जाएगी। पर्व-त्यौहार के समय बच्चों के बीच जाकर उनके साथ पर्व की खुशी बांटती हूं। उनके दुख में खुद को शामिल करती हूं। एक छोटी सी मदद से उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

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