आधुनिक श्रवण कुमार की यह कहानी आपको अंदर तक हिला देगी

( Telangana News ) वाल्मीकि रामायण ( Valmiki Ramayan ) के अयोध्याकाण्ड के 64 वें अध्याय में श्रवण कुमार ( Shravan Kumar story ) की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार श्रवण कुमार ( Modern Shravan Kumar ) ने एक कंधे पर कांवड़ में अपने अंधे-माता-पिता को बिठा कर तीर्थ यात्रा कराई। ऐसे ही एक माता-पिता के आधुनिक श्रवण कुमार ने इस लॉक डाउन में अपनी गर्भवती पत्नी और नन्ही बेटी को काठ की गाड़ी खींचते हुए 800 किलोमीटर की दूरी तय की।

हैदराबाद(तेलंगाना): ( Telangana News ) वाल्मीकि रामायण ( Valmiki Ramayan ) के अयोध्याकाण्ड के 64 वें अध्याय में श्रवण कुमार ( Shravan Kumar story ) की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार श्रवण कुमार ( Modern Shravan Kumar ) ने एक कंधे पर कांवड़ में अपने अंधे-माता-पिता को बिठा कर तीर्थ यात्रा कराई। ऐसे ही एक माता-पिता के आधुनिक श्रवण कुमार ने इस लॉक डाउन में अपनी गर्भवती पत्नी और नन्ही बेटी को काठ की गाड़ी खींचते हुए 800 किलोमीटर की दूरी तय की।

जज्बा कम नहीं हुआ

अंदर तक हिला देने वाली यह दास्तान है रामू की। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में नौकरी करने वाला रामू अपनी गर्भवती पत्नी धंवंत और दो साल की बेटी अनुरागिनी के साथ पैदल 800 किलोमीटर का सफर तय कर मध्यप्रदेश स्थित अपने गांव कुंडेमोह पहुंचा। पैरों में छाले पड़ गए। हाथों की लकीरें का स्थान रस्सियों से बने घावों की लकीरों ने ले लिया पर उसका अदम्य जज्बा कम नहीं हुआ। पत्नी-बच्ची के खातिर भूखे-प्यासे वह दिन-रात चलता रहा, आखिर मंजिल पर पहुचं कर ही दम लिया। उसकी यह दर्दभरी दास्तान राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा की जा रही मदद के दावों की असलियत भी उजागर करती है।

भूखे मरने की हालत में लिया यह निर्णय
लॉकडाउन के कारण हैदराबाद में रामू को काम मिलना बंद हो गया। उसके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। मदद के लिए कई लोगों से मिन्नतें कीं, लेकिन किसी ने उसकी सहायता नहीं की। आखिरकार गर्भवती पत्नी और बेटी की खातिर उसने जब तक सांस है तब तक आस है की तर्ज पर पैदल ही मंजिल तय करने का निर्णय लिया। हैदराबाद से मध्यप्रदेश स्थित अपने गृह जिले बालाघाट लौटने का निर्णय लिया। रामू अपनी पत्नी और दो साल की बेटी को लेकर सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर निकल पड़ा। गरीब रामू के पास मास्क खरीदने तक के पैसे नहीं थे। इसलिए वो, उसकी पत्नी और नन्हीं बेटी को बिना मास्क पहने इतना लंबा सफर तय करना पड़ा।

हाथगाड़ी से खींचा 800 किलोमीटर तक
रामू ने एक हाथगाड़ी तैयार की। एक लकड़ी के तख्ते के नीचे लोहे क पहिये लगाए। उस पर पत्नी और बेटी को बिठाया। इसके बाद शुरु किया एक ऐसा सफर जिसके परिणाम कुछ भी हो सकते थे, किन्तु उसके जज्बे ने सभी मुसीबतों का सामना करते हुए मंजिल तय कर ली। रामू लगातार 17 दिन तक अपनी गर्भवती पत्नी और बच्चे को हाथगाड़ी में बिठा खींचकर लाया ।

बिस्किट खाकर जीवित रहे
इस दर्दनाक सफर की कहानी में रामू और उसके परिवार ने को बस एक बार ही खाना नसीब हुआ। पूरे रास्ते सिर्फ बिस्किट खाकर गुजार दिया जो उन्हें राहगीरों ने दिए थे। तीनों जब मध्यप्रदेश के बालाघाट के राजेगांव इलाके पहुंचे तो पुलिस ने इन्हें स्क्रीनिंग के लिए रोका। मजदूर परिवार की कहानी सुनकर पुलिसकर्मियों ने उन्हें खाना और पानी दिया। नंगे पांव बच्ची को चप्पलें दी और उन्हें घर पहुंचाने के लिए प्राइवेट वाहन का इंतजाम किया।

कंस्ट्रक्शन साइट पर था मजदूर
रामू बालाघाट के कुदेमोह गांव के निवासी हैं और उन 86 हजार प्रवासी मजदूरों में हैं जो पिछले हफ्ते ही जिले में लौटे हैं। रामू हैदराबाद में एक कंस्ट्रक्शन साइट में काम करता था। लॉकडाउन के चलते काम धंधा बंद होने परिवार की माली बिगड़ती गई और एक वक्त खाने के जुगाड़ के लिए भी पैसे कम पडऩे लगे।

परिवार को पैदल नहीं चलाया
रामू ने बताया, 'हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसलिए घर जाने का फैसला किया।' रामू के लिए यह सफर जोखिम भरा था। उसकी पत्नी 8 महीने की गर्भवती थी और चिलचिलाती गर्मी में वह उन्हें पैदल सफर नहीं कराना चाहता था। उसने बताया कि, 'हमारे पास ट्रक के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए मैंने हाथगाड़ी बनाने का फैसला किया। टूटे पाइप, प्लास्टिक की कतरन और रस्सियों से मैंने हाथगाड़ी बनाई।' रामू जब घर पहुंचा तब घर में सिर्फ एक खाट और कुछ टूटे हुए बर्तन ही परिवार को मिले। अब रामू यहीं रह कर जैसे भी हो मेहनत-मजदूरी करके अपनी गुजर-बसर करेगा।

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Yogendra Yogi Desk
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