किसी भी अस्पताल में ले जाओ, नहीं मांगेगे पैसा

- सड़क हादसे में घायल को अब मिल सकेगा कैशलेस इलाज
- एक्सीडेंट इंश्योरेंस सिस्टम के लिए अंस्र्ट एंड यंग को मिला कांट्रेक्ट

By: Pawan Rathore

Published: 07 Jun 2018, 12:00 PM IST

इंदौर।
सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को किसी भी अस्पताल में कैशलेस इलाज मिल सकेगा। एमपीआरडीसी इसके लिए एक्सीडेंट इंश्योरेंस सिस्टम विकसित करने पर काम कर रहा है। सिस्टम को विकसित करने के लिए जीआईएस का काम संभालने वाली लीडिंग फर्म अंस्र्ट एंड यंग को कांट्रेक्ट मिला है।
इस सिस्टम के लिए एडीबी से पैसा मिल रहा है। आरडीसी इसके लिए राष्ट्रीय स्तर की बीमा कंपनियों को हायर करेगी। सड़क पर चलने वाले हर शख्स का बीमा होगा। जब भी कोई हादसे में घायल होता है तो उसे तुरंत नजदीकी किसी भी अस्पताल में पहुंचाया जाएगा। अस्पताल चाहे निजी और या सरकारी, घायल से किसी भी तरह का पैसा लिए बिना इलाज शुरू कर दिया जाएगा। इलाज में लगने वाला खर्च बाद में बीमा कंपनी के जरिए अस्पताल को मिल जाएगा। फिलहाल यह पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जा रहा है। इसमें प्रदेश के चार प्रमुख शहरों को शामिल किया गया है, जिसमें इंदौर के साथ भोपाल, रीवा और सतना हैं। अंस्र्ट एंड यंग इस प्रोजेक्ट के लिए आर्थिक व्यवहारिकता का सर्वे, कानूनी पहलुओं का अध्ययन करेगी और डीपीआर तैयार कर बीमा कंपनी को हायर करेगी। माना जा रहा है कि करीब छह महीने में यह प्रोजेक्ट धरातल पर आ जाएगा।
बीमा कंपनियां देंगी तत्काल मदद
आरडीसी बीमा कंपनियों को ऐसे उत्पाद के लिए हायर करेगा, जिसमें सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति बीमित हो जाएगा। हादसे की दशा में उसे तत्काल आर्थिक मदद मिलेगी। हालांकि अभी यह सुविधा कुछ राष्ट्रीय राजमार्गों पर है, लेकिन प्रदेश में यह पहली बार होगा कि घायल किसी भी अस्पताल में ले जाए जा सकेंगे और उनसे इलाज का पैसा नहीं लिया जाएगा। बाद में बीमा क्लेम के जरिए मिलने वाले पैसे से इसकी भरपाई होगी।
अभी लग जाते हैं दो साल तक
वैसे तो रोड एक्सीडेंट में घायलों के इलाज को लेकर मोटर वेहिकल एक्ट में प्रावधान है। इसमें साफ है कि किसी भी वाहन से हादसा होने की दशा में घायल को वाहन मालिक या बीमा कंपनी की तरफ से थर्ड पार्टी के रूप में क्लेम मिलेगा। इसके बाद भी घायल अस्पतालों में कैशलेस सुविधा नहीं हासिल कर सकते। बाद में क्लेम करने पर मुआवजा मिलता है। क्लेम कोर्ट के जरिए ही सेटल हो पाते हैं। इसमें डेढ़ से दो साल लगना सामान्य बात है।

Pawan Rathore
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