मुबारक हो इंदौर,दोबारा अव्वल आने की बधाई

अब नंबर वन बनना भी इंदौर की आदत में है

अमित मंडलोई
संपादक,पत्रिका इंदौर

इंदौर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर वह ठान ले तो फिर उसके लिए न कोई लक्ष्य बड़ा है और ना ही कोई चुनौती दुष्कर। इंदौर की रगों में जुनून बहता है, जिसके आगे बड़ी से बड़ी कसौटियां घुटने टेक देती हैं। पूरे देश में सबसे स्वच्छ शहर का तमगा निश्चित तौर पर पूरे शहर की जीत है। शहरवासियों के जज्बे की जीत है, जिसने नगर निगम और प्रशासन के साथ मिलकर यह करिश्मा कर दिखाया।
हां, यह करिश्मा ही था, क्योंकि पिछले सर्वेक्षण में भी हम 1 नंबर पर थे,इसलिए हमसे प्रतियोगिता करने वालों की संख्या भी अधिक थी और मेहनत करने वाले शहर भी। दो साल पहले के दो सर्वेक्षणों में मैसूर लगातार नंबर एक पर बना हुआ था। छोटा शहर होने के साथ ही उसकी रणनीति और संसाधन दोनों ही बेमिसाल थे। सफाई वहां लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी थी जबकि हमारे लिए सफाई शून्य के आसपास से शुरू करने जैसी बात थी। क्योंकि अनगिनत चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी थीं। मोहल्लों व कॉलोनियों में सुबह जल्दी होने वाली सफाई कुछ ही घंटों में बर्बाद हो जाती थी, क्योंकि घरों का सारा कचरा सडक़ पर आ जाता था। यही हाल बाजारों के भी थे, सुबह चमचमाते दिखते, लेकिन दुकानें खुलते ही सब गुड़-गोबर हो जाता। वेस्ट ट्रीटमेंट के मामले में भी हमारी स्थिति ठीक नहीं थी। वजह साफ थी कि कभी हमने सफाई को इतनी प्राथमिकता से लिया ही नहीं। संसाधन के नाम पर बड़े-बड़े कंटेनर, कचरापात्र आदि खरीदे गए, लेकिन उन्हें उठाने और ठिकाने लगाने की व्यवस्था बन ही नहीं पा रही थी। नतीजा देश का सबसे तेजी से बढ़ता शहर होने के बावजूद सफाई के मामले में हम फिसड्डी ही रहे। क्योंकि सोच नहीं बदल पा रही थी। लोग अपने घर, दुकान, दफ्तर तो साफ रखना चाहते थे, लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर उनकी स्वेच्छाचारिता सारे प्रयासों पर भारी पड़ रही थी। इन्हीं आदतों के चलते अस्पताल, बगीचे, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थल पर सफाई टिक ही नहीं पा रही थी।
स्वच्छता सर्वेक्षण के जरिये देश में एक अनूठी प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। शहरों की रैकिंग पहले भी आती थी, लेकिन दो सर्वेक्षण से जब इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू हुए तो इंदौर के भीतर सदैव लबालब रहने वाला जीत का जज्बा भी हिलोरे लेने लगा और दोबारा जीतना तो हमारे लिए सोने पर सुहागा था। विभिन्न योजनाओं के तहत संसाधन जुटाए गए। व्यवस्थाएं जमाई गईं। कर्मचारियों को तैनात किया गया और समवेत स्वर में सब सडक़ों पर उतर आए। डोर टू डोर कचरा संग्रहण शुरू हुआ तो लोगों की आदतों में बदलाव आने लगा। कॉलोनियों से लेकर गली-मोहल्लों और बाजारों में कचरापात्र रखे गए, उनमें कचरा संग्रहण और निपटान की व्यवस्था सुचारू की गई। आधी-आधी रात को केसरिया जैकेट पहने रेडियम पट्टी वाले कर्मचारियों को सफाई में भिड़े देख लोगों की आंखें खुलीं। उन्होंने घर के साथ ही सार्वजनिक स्थलों पर भी सफाई को अपनी आदत बनाया। दूसरों को भी प्रेरित किया। इंदौर को स्वच्छ बनाना है, अब हमने यह ठाना है। हल्ला है हल्ला... शहर की गली-गली में मंत्र की तरह गूंजने लगा।
सबसे पहले हम ओडीएफ मुक्त घोषित हुए। यह भी अपने आप में एक बड़ा कदम था, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच बड़े स्तर पर जारी थी। इसे खत्म करने के कई प्रयास पहले ही धराशायी हो चुके थे। इस बार अफसरों की सजगता और सतत निगरानी के फलस्वरूप शहर इस कलंक से उबरने में कामयाब हुआ। नगर निगम, प्रशासन और शहर तीनों ने सफाई को मिशन की तरह लिया। जो सुधर गए उन्हें सफाई का तोहफा मिला और जो बदलने को तैयार नहीं हुए उन पर जुर्माना ठोंका गया। नतीजा हम सबके सामने है। आज शहर अपनी इस उपलब्धि पर गर्व कर रहा है। यह सार्वजनिक हितों के लिए एक शहर के समवेत प्रयासों का अनूठा उदाहरण बन गया है, जो लंबे समय तक बाकी लोगों को भी प्रेरणा देता रहेगा।
हालांकि इसी के साथ हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। इस तमगे को बरकरार रखने के लिए हमें दोगुनी ताकत से काम करना होगा। सफाई जो हमारी आदत का हिस्सा बन चुकी है, उसे ऐसे ही बरकरार रखना होगा। और ठोस अपशिष्ट के समुचित निराकरण सहित कुछ मोर्चें बाकी हैं, जिन पर हमें काम करना है। हालांकि अब सारे हाथ मिल चुके हैं, इसलिए अब कुछ भी मुश्किल नहीं है।

अर्जुन रिछारिया Incharge
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